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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३६६श्रीरामकृष्णवचनामृत९ दिसम्बर, १८८३

तो विवाह हो चुका है, लड़के-बच्चे भी हुए हैं, क्या इतने पर भी ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है? (थोड़ा सोचकर) अवश्य ही किया जा सकता है, नहीं तो ये वैसा क्यों कहते? उनकी कृपा होने से क्यों न होगा?

“सामने यह जगत् दिखायी दे रहा है – ये सूर्य, चन्द्र, तारे, जीव, चौबीस तत्त्व – ये सब कैसे उत्पन्न हुए, इनका करतार कौन है, मैं, उनका कौन हूँ, यह न जानने पर जीवन ही व्यर्थ है।

“श्रीरामकृष्ण पुरुषश्रेष्ठ हैं। ऐसे महापुरुष मैंने जीवन में आज तक नहीं देखे। इन्होंने अवश्य ही ईश्वर को देखा है। अन्यथा, ये 'माँ माँ' कहते हुए दिनरात किसके साथ बातचीत करते रहते हैं! अन्यथा, ईश्वर पर इनका इतना प्रेम कैसे हो सकता है! इतना प्रेम कि एकदम बाह्यज्ञानरहित हो जाते हैं! समाधिमग्न जड़वत् हो जाते हैं! फिर कभी प्रेम में मतवाले होकर हँसते, रोते नाचते और गाते हैं।”

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CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar