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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 393
३७०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ दिसम्बर, १८८३

त्याग और प्रारब्ध। वामाचार-साधन का निषेध

(भक्तों से) “मन में लाने से ही त्याग नहीं किया जा सकता। प्रारब्ध, संस्कार ये सभी हैं। एक राजा से किसी योगी ने कहा, 'तुम मेरे पास बैठकर परमात्मा का चिन्तन करो।' राजा ने उत्तर दिया, 'यह मुझसे न होगा। मैं यहाँ रह सकता हूँ; परन्तु मुझे अब भी भोग करना है। इस वन में अगर रहूँगा तो आश्चर्य नहीं कि इस वन में भी एक राज्य हो जाए। मेरा भोग अभी बाकी है।'

“नटवर पाँजा जब बच्चा था, इस बगीचे में जानवर चराता था। परन्तु उसके भाग्य में बहुत बड़ा भोग था; इसीलिए तो इस समय अण्डी का कारखाना खोलकर इतना रुपया इकट्ठा किया है। आलमबाजार में अण्डी का रोजगार खूब चला रहा है।

“एक मत में है, स्त्री लेकर साधना करना। 'कर्ताभजा' सम्प्रदाय की स्त्रियों के बीच में एक बार एक आदमी मुझे ले गया था। वे सब मेरे पास आकर बैठ गयीं। मैं जब उन्हें 'माँ माँ' कहने लगा तब वे आपस में कहने लगीं, ये प्रवर्त्तक हैं, अभी 'घाट' की पहचान इनको नहीं हुई! उन लोगों के मत में कच्ची अवस्था को प्रवर्त्तक कहते हैं, उसके बाद साधक, उसके बाद सिद्ध और फिर सिद्ध का सिद्ध।

“एक स्त्री वैष्णवचरण के पास जाकर बैठी। वैष्णवचरण से पूछने पर उन्होंने कहा, इसका बालिका-भाव है।

“स्त्री-भाव से शीघ्र पतन होता है। मातृभाव शुद्ध भाव है।”

काँसारीपाड़ा के भक्तगण उठ पड़े। कहा, तो अब हम लोग चलें; कालीमाई तथा और देवों के दर्शन करेंगे।

(२)

श्रीरामकृष्ण और प्रतिमापूजा। व्याकुलता और ईश्वरलाभ

मणि पंचवटी और कालीमन्दिर के विभिन्न स्थानों में अकेले घूम रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा है, 'थोड़ी साधना करने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं।' क्या मणि यही सोच रहे हैं?

फिर श्रीरामकृष्ण ने तीव्र वैराग्य की बात कही और कहा कि माया को पहचान लेने पर वह भाग खड़ी होती है। मणि यही सब सोच रहे हैं।

पिछला पहर है, साढ़े तीन बजे का समय होगा। मणि फिर आकर श्रीरामकृष्ण के कमरे में बैठे हैं। ब्राउन इन्स्टिट्यूशन से एक शिक्षक कुछ छात्रों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हुए हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे वार्तालाप कर रहे हैं। शिक्षक महाशय बीच बीच में एक एक प्रश्न कर रहे हैं। बातचीत मूर्तिपूजन के सम्बन्ध में हो रही है।