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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३७६श्रीरामकृष्णवचनामृत१५ दिसम्बर, १८८३

उनसे प्रार्थना करने पर, उनके नामगुण का सदा कीर्तन करने पर, क्रमश: उन पर वैसा ही प्यार हो जाता है।”

यह कहकर श्रीरामकृष्ण प्रेमोन्मत्त हो कमरे के भीतर नाचते हुए टहलने और गाने लगे –

(भावार्थ) – “सुरधुनी के तट पर कौन हरिनाम ले रहा है? शायद प्रेमदाता नित्यानन्द आए हैं। उनके बिना प्राण कैसे शीतल हों?”

करीब दस बजे होंगे। रामलाल ने कालीमन्दिर की नित्यपूजा समाप्त कर दी है। श्रीरामकृष्ण माता के दर्शन करने के लिए कालीमन्दिर जा रहे हैं। साथ मणि भी हैं। मन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण आसन पर बैठ गए। माता के चरणों पर दो-एक फूल उन्होंने अर्पित किए। अपने मस्तक पर फूल रखकर ध्यान कर रहे हैं। अब गीत गाकर माता की स्तुति करने लगे –

“हे शंकरि, मैंने सुना है तुम्हारा नाम भवहरा भी है। इसीलिए माँ, मैंने तुम्हें अपना भार दे दिया है, – तुम तारो चाहे न तारो।” ...

श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर से लौटकर अपने कमरे के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में बैठे। दिन के दस बजे का समय होगा। अब भी देवताओं का भोग या भोग-आरती नहीं हुई। माता काली और श्रीराधाकान्त के प्रसादी फल-मूल आदि से कुछ लेकर श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा जलपान किया। राखाल आदि भक्तों को भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद मिल चुका है।

श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए राखाल स्माइल की ‘सेल्फ-हेल्प’? (Smile's Self-help) पढ़ रहे हैं – लार्ड अर्सिकन (Lord Erskine) के सम्बन्ध में।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – इसमें क्या लिखा है?

मास्टर – साहब फल की आकांक्षा न करके कर्तव्य-कर्म करते थे – यही लिखा है। निष्काम-कर्म।

श्रीरामकृष्ण – तब तो अच्छा है। परन्तु पूर्ण ज्ञान का लक्षण है कि एक भी पुस्तक साथ न रहेगी। जैसे शुकदेव – उनका सब कुछ जिह्वा पर।

“पुस्तकों और शास्त्रों में शक्कर के साथ बालू भी मिली हुई है। साधु शक्कर भर का हिस्सा ले लेता है, बालू छोड़ देता है। साधु सार पदार्थ लेता है।”

शुकदेवादि का नाम लेकर क्या ठाकुर अपनी अवस्था समझाना चाहते हैं?

वैष्णवचरण कीर्तनिया (कीर्तन गानेवाले) आये हुए हैं; उन्होंने ‘सुबोल-मिलन’ नाम का कीर्तन गाकर सुनाया।

कुछ देर बाद रामलाल ने थाली में श्रीरामकृष्ण के लिए प्रसाद ला दिया। प्रसाद पाकर श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम करने लगे।

रात में मणि नौबतखाने में सोये। श्रीमाताजी जब श्रीरामकृष्ण की सेवा के लिए आती थीं तब इसी नौबतखाने में रहती थीं। कुछ मास हुए वे कामारपुकुर गयी हैं।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar