श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ मार्च, १८८२ | परिच्छेद ३ | १७
उसकी आँखें खुलती और पंख निकल आते हैं। आँखें खुलने से जब वह बच्चा देखता है कि मैं गिर रहा हूँ और जमीन पर गिरकर चूर चूर हो जाऊँगा, तब वह एकदम अपनी 'माँ की ओर फिर ऊँचे चढ़ जाता है।”
नरेन्द्र उठ गए।
सभा में केदार, प्राणकृष्ण, मास्टर आदि और भी कई सज्जन थे।
श्रीरामकृष्ण – देखो, नरेन्द्र गाने में, बजाने में, पढ़ने-लिखने में – सब विषयों में अच्छा है। उस दिन केदार के साथ उसने तर्क किया था। केदार की बातों को खटाखट काटता गया। (श्रीरामकृष्ण और सब लोग हँस पड़े।) – (मास्टर से) अंग्रेजी में क्या कोई तर्क की किताब है?
मास्टर – जी हाँ है, अंग्रेजी में इसको न्यायशास्त्र (Logic) कहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, कैसा है कुछ सुनाओ तो।
मास्टर अब मुश्किल में पड़े। आखिर कहने लगे – एक बात यह है कि साधारण सिद्धान्त से विशेष सिद्धान्त पर पहुँचना; जैसे, सब मनुष्य मरेंगे, पण्डित भी मनुष्य हैं, इसलिए वे भी मरेंगे।
“और एक बात यह है कि विशेष दृष्टान्त या घटना को देखकर साधारण सिद्धान्त पर पहुँचना। जैसे यह कौआ काला है, वह कौआ काला है और जितने कौए दीख पड़ते हैं, वे भी काले हैं, इसलिए सब कौए काले हैं।
“किन्तु उस प्रकार के सिद्धान्त से भूल भी हो सकती है; क्योंकि सम्भव है ढूँढ़-तलाश करने से किसी देश में सफेद कौआ मिल जाय। एक और दृष्टान्त – जहाँ वृष्टि है, वहाँ मेघ भी है, अतएव यह साधारण सिद्धान्त हुआ कि मेघ से वृष्टि होती है। और भी एक दृष्टान्त – इस मनुष्य के बत्तीस दाँत हैं, उस मनुष्य के बत्तीस दाँत हैं, और जिस मनुष्य को देखते हैं, उसी के बत्तीस दाँत हैं, अतएव सब मनुष्यों के बत्तीस दाँत हैं।
“इस प्रकार के साधारण सिद्धान्त की बातें अंग्रेजी न्यायशास्त्र में हैं।”
श्रीरामकृष्ण ने इन बातों को सुन भर लिया। फिर वे अन्यमनस्क हो गए इसलिए यह प्रसंग और आगे न बढ़ा।
(३)
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि।। (गीता, २।५३)
समाधि में
सभा भंग हुई। भक्त सब इधर-उधर घूमने लगे। मास्टर भी पंचवटी आदि स्थानों में घूम रहे थे। समय पाँच के लगभग होगा। कुछ देर बाद वे श्रीरामकृष्ण के कमरे में आए