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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३८४श्रीरामकृष्णवचनामृत१७ दिसम्बर, १८८३

मणि – जी हाँ, इनके बारे में लोगों को ज्ञात है, पर इनके अलावा और भी कितने ही ज्ञानी इनकी तरह के हो गए होंगे।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ज्ञानी की सब वासना चली जाती है। – जो कुछ रह जाती है, उसमें कोई हानि नहीं होती। पारस पत्थर के छू जाने पर तलवार सोने की हो जाती है, फिर उस तलवार से हिंसा का काम नहीं होता। इसी तरह ज्ञानी में कामक्रोध का आकार मात्र रहता है, – नाममात्र – उससे कोई अनर्थ नहीं होता।

मणि – आप जैसा कहा करते हैं, ज्ञानी तीनों गुणों से परे हो जाता है। सत्त्व, रज, और तम – किसी गुण के वश में वह नहीं रहता। ये तीनों गुण डकैत हैं।

श्रीरामकृष्ण – इस बात की धारणा करनी चाहिए।

मणि – पूर्णज्ञानी संसार में शायद तीन-चार मनुष्यों से अधिक न होंगे।

श्रीरामकृष्ण – क्यों? पश्चिम के मठों में तो बहुत से साधुसंन्यासी दीख पड़ते हैं।

मणि – जी, इस तरह का संन्यासी तो मैं भी हो जाऊँ!

इस बात पर श्रीरामकृष्ण कुछ देर तक मणि की ओर देखते रहे।

श्रीरामकृष्ण (मणि से) – क्या? सब त्यागकर?

मणि – माया के बिना गए क्या होगा? माया को जीत न पाया तो केवल संन्यासी होकर क्या होगा?

सब लोग कुछ समय तक चुप रहे।

त्रिगुणातीत भक्त बालक के समान

मणि – अच्छा त्रिगुणातीत भक्ति किसे कहते हैं?

श्रीरामकृष्ण – उस भक्ति के होने पर भक्त सब चिन्मय देखता है। चिन्मय श्याम, चिन्मय धाम – भक्त भी चिन्मय – सब चिन्मय! ऐसी भक्ति कम लोगों की होती है।

डाक्टर मधु (सहास्य) – त्रिगुणातीत भक्ति, अर्थात् भक्त किसी गुण के वश नहीं।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, जैसे पाँच साल का लड़का – किसी गुण के वश नहीं।

दोपहर को, भोजन के बाद, श्रीरामकृष्ण थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। श्री मणिलाल मल्लिक ने आकर प्रणाम किया; फिर जमीन पर बैठ गए। मणि भी जमीन पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण लेटे लेटे ही मणि मल्लिक के साथ बीच बीच में एक एक बात कह रहे हैं।

मणि मल्लिक – आप केशव सेन को देखने गए थे?

श्रीरामकृष्ण – हाँ। अब वे कैसे हैं?

मणि मल्लिक – रोग कुछ घटता हुआ नहीं दीख पड़ता।

श्रीरामकृष्ण – मैंने देखा, बड़ा राजसिक है। मुझे बड़ी देर तक बैठा रखा, तब भेंट