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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 429
४०६श्रीरामकृष्णवचनामृत२४ दिसम्बर, १८८३

कि कहीं लोगों पर उनकी दृष्टि न जाए। द्वादशवन देखने लायक है।

बाँकेबिहारी को देखकर मुझे भाव हो गया था; मैं उन्हें पकड़ने चला था। गोविन्दजी को दुबारा देखने की इच्छा नहीं हुई। मथुरा में जाकर राखाल-कृष्ण का स्वप्न देखा था। हृदय और मथुरबाबू ने भी देखा था।”

(सुरेन्द्र से) – “तुम्हारे योग भी है और भोग भी है।

“ब्रह्मर्षि, देवर्षि और राजर्षि। ब्रह्मर्षि जैसे शुकदेव – एक भी पुस्तक पास नहीं है। देवर्षि जैसे नारद। राजर्षि जैसे जनक – निष्काम कर्म करते हैं।

“देवीभक्त धर्म और मोक्ष दोनों पाता है तथा अर्थ और काम का भी भोग करता है।

“तुम्हें एक दिन मैंने देवीपुत्र देखा था। तुम्हारे दोनों हैं, योग और भोग। नहीं तो तुम्हारा चेहरा सूखा हुआ होता।

“सर्वत्यागी का चेहरा सूखा हुआ होता है। एक देवीभक्त को घाट पर मैंने देखा था। भोजन करते हुए ही वह देवीपूजा कर रहा था। उसका सन्तान-भाव था।

“परन्तु अधिक धन होना अच्छा नहीं। यदु मल्लिक को इस समय देखा, डूब गया है। अधिक धन हो गया है न।

“नवीन नियोगी के भी योग-भोग दोनों हैं। दुर्गापूजा के समय मैंने देखा, पिता-पुत्र दोनों चँवर डुला रहे थे।”

सुरेन्द्र – अच्छा महाराज, ध्यान क्यों नहीं होता?

श्रीरामकृष्ण – स्मरण-मनन तो है न?

सुरेन्द्र – जी हाँ, ‘माँ माँ’ कहता हुआ सो जाता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – बहुत अच्छा है, स्मरण-मनन रहने से ही हुआ।

श्रीरामकृष्ण ने सुरेन्द्र का भार ले लिया है; अब उन्हें चिन्ता किस बात की?

(३)

श्रीरामकृष्ण और योगशिक्षा। शिवसंहिता

सन्ध्या के बाद श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। मणि भी भक्तों के साथ जमीन पर बैठे हैं। योग के सम्बन्ध में, षट्चक्रों के सम्बन्ध में बातचीत हो रही है। ये सब बातें शिवसंहिता में हैं।

श्रीरामकृष्ण – इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना – सुषुम्ना के भीतर सब पद्म हैं – सभी चिन्मय। जैसे मोम का पेड़, – डाल, पत्ते, फल, – सब मोम के। मूलाधार पद्म में कुण्डलिनी-शक्ति है। वह पद्म चतुर्दल है। जो आद्याशक्ति हैं, वही कुण्डलिनी के रूप में सब की देह में विराजमान हैं – जैसे सोता हुआ साँप कुण्डलाकार पड़ा रहता है। ‘प्रसुप्तभुजगाकारा आधारपद्मवासिनी।’ (मणि से) भक्तियोग से कुलकुण्डलिनी शीघ्र