श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ७०
रामचन्द्र दत्त के बगीचे में
आज बुधवार है, २६ दिसम्बर १८८३ ई.। श्रीरामकृष्ण रामबाबू का नया बगीचा देखने जा रहे हैं।
रामबाबू श्रीरामकृष्ण को साक्षात् अवतार जानकर उनकी पूजा करते हैं। वे प्रायः दक्षिणेश्वर में आते हैं और श्रीरामकृष्ण के दर्शन तथा उनकी पूजा करते हैं। सुरेन्द्र के बगीचे के पास उन्होंने नया बगीचा तैयार किया है। इसी बगीचे को देखने के लिए श्रीरामकृष्ण जा रहे हैं।
गाड़ी में मणिलाल मल्लिक, मास्टर तथा अन्य दो-एक भक्त हैं। मणिलाल मल्लिक ब्राह्म समाज के हैं। ब्राह्म भक्तगण अवतार नहीं मानते हैं।
श्रीरामकृष्ण (मणिलाल के प्रति) – उनका ध्यान करना हो तो पहले उनके उपाधिशून्य स्वरूप का ध्यान करने की चेष्टा करनी चाहिए। वे उपाधियों से शून्य, वाक्य और मन से परे हैं। परन्तु इस ध्यान द्वारा सिद्धि प्राप्त करना बहुत ही कठिन है।
“वे मनुष्य में अवतीर्ण होते हैं, उस समय ध्यान करने की विशेष सुविधा होती है। मनुष्य के बीच में नारायण हैं। देह आवरण है, मानो लालटेन के भीतर बत्ती जल रही है, या मानो काँच में से भीतर की बहुमूल्य वस्तुएँ दिखायी दे रही हैं।”
गाड़ी से उतरकर श्रीरामकृष्ण बगीचे में पहुँचे। राम तथा अन्य भक्तों के साथ पहले तुलसी-कानन देखने के लिए जा रहे हैं।
तुलसी-कानन देखकर श्रीरामकृष्ण खड़े होकर कह रहे हैं, “वाह, सुन्दर स्थान है यह! यहाँ पर ईश्वर का चिन्तन अच्छा होता है।”
श्रीरामकृष्ण अब तालाब के दक्षिणवाले कमरे में आकर बैठे। रामबाबू ने थाली में अनार, सन्तरा तथा कुछ मिठाई लाकर उन्हें दी। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ आनन्द करते हुए फल आदि ग्रहण कर रहे हैं।
कुछ देर बाद सारे बगीचे में घूम रहे हैं।
अब पास ही सुरेन्द्र के बगीचे में जा रहे हैं। थोड़ी देर पैदल जाकर गाड़ी में बैठेंगे। गाड़ी से सुरेन्द्र के बगीचे में जाएँगे।
भक्तों के साथ पैदल जाते हुए श्रीरामकृष्ण ने देखा कि पासवाले बगीचे में एक वृक्ष