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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४३० श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ जनवरी, १८८४

करना चाहिए।

“त्याग के बिना कोई कैसे उन्हें पा सकता है? अगर एक वस्तु के ऊपर दूसरी वस्तु रखी हो, तो पहली वस्तु को बिना हटाये दूसरी वस्तु कैसे मिल सकती है?

“निष्काम होकर उन्हें पुकारना चाहिए। परन्तु सकाम भजन करते करते भी निष्काम भजन होता है। ध्रुव ने राज्य के लिए तपस्या की थी, परन्तु उन्होंने ईश्वर को प्राप्त किया था। उन्होंने कहा था, अगर कोई काँच के लिए आकर कांचन पा जाय तो उसे क्यों छोड़े?

दया-दान आदि और श्रीरामकृष्ण। श्रीचैतन्य देव का दान

“सत्त्वगुण के पाने पर मनुष्य ईश्वर को पाता है। संसारी मनुष्यों के दानादि कर्म प्रायः सकाम ही होते हैं। यह अच्छा नहीं। निष्काम कर्म करना ही अच्छा है। परन्तु निष्काम भाव से करना है बड़ा कठिन।

“ईश्वर से भेंट होने पर क्या उनसे यह प्रार्थना करोगे कि मैं कुछ तालाब खुदवाऊँगा? या रास्ता, घाट, दवाखाना और अस्पताल बनवाऊँगा? क्या उनसे कहोगे, हे ईश्वर, मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं यही सब करूँ? उनका दर्शन होने पर ये सब वासनाएँ एक ओर पड़ी रहती हैं।

“परन्तु इसलिए क्या दया और दान के कर्म ही न करना चाहिए?

“नहीं, यह बात नहीं। आँखों के आगे दुःख और विपत्ति देखकर धन के रहते सहायता आवश्यक करनी चाहिए। ऐसे समय ज्ञानी कहता है, 'दे, इसे कुछ दे।' परन्तु भीतर ही भीतर 'मैं क्या कर सकता हूँ - कर्ता ईश्वर ही हैं, अन्य सब अकर्ता हैं' - ऐसा बोध उसे होता रहता है।

“महापुरुषगण जीवों के दुःख से दुःखी होकर उन्हें ईश्वर का मार्ग बतला जाते हैं। शंकराचार्य ने जीवों की शिक्षा के लिए 'विद्या का अहं' रखा था।

“अन्नदान की अपेक्षा ज्ञानदान और भक्तिदान अधिक ऊँचा है। चैतन्यदेव ने इसीलिए चाण्डालों तक में भक्ति का वितरण किया था। देह का सुख और दुःख तो लगा ही है। यहाँ आम खाने के लिए आये हो, आम खा जाओ। आवश्यकता ज्ञान और भक्ति की है। ईश्वर ही वस्तु है, और सब अवस्तु।

क्या स्वाधीन इच्छा (Free Will) है? श्रीरामकृष्ण का सिद्धान्त

“सब कुछ वे ही कर रहे हैं। अगर यह कहो कि सब कुछ उनके मत्थे मढ़कर फिर तो मनुष्य खूब पाप कर सकता है, तो यह ठीक न होगा; क्योंकि जिसने यह समझा है कि ईश्वर ही कर्ता है और जीव अकर्ता, उसका पैर कभी बेताल नहीं पड़ सकता।

“इंग्लिशमैन जिसे स्वाधीन इच्छा (Free Will) कहते हैं, वह उन्हींने दे रखी है।

“जिन लोगो ने उन्हें नहीं पाया, उनमें अगर इस स्वाधीन इच्छा का बोध न होता

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar