श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ५६
ईश्वर ही एक मात्र सत्य है।
(१)
दक्षिणेश्वर मन्दिर में राखाल, मास्टर, मणिलाल आदि के साथ
श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद कुछ विश्राम कर रहे हैं। जमीन पर मणि मल्लिक बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण के हाथ में अब भी तख्ती बँधी हुई है। मास्टर आकर प्रणाम करके जमीन पर बैठ गये। आज रविवार है, दि. २४ फरवरी १८८४।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – किस तरह आये?
मास्टर – जी, आलमबाजार तक किराये की गाड़ी पर आया, वहाँ से पैदल।
मणिलाल – ओह! बिलकुल पसीने-पसीने हो गये हैं।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इसलिए सोचता हूँ कि मेरे सब अनुभव सिर्फ मस्तिष्क के ही खयाल नहीं हैं; नहीं तो ये सब इतने 'इंग्लिशमैन' (अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग) इतनी तकलीफ करके क्यों आते हैं!
श्रीरामकृष्ण अपने स्वास्थ के बारे में बोल रहे हैं, हाथ टूटने की बात हो रही है।
श्रीरामकृष्ण – मैं इसके लिए कभी कभी अधीर हो जाता हूँ। – इसे दिखाता हूँ, फिर उसे दिखाता हूँ, और पूछता हूँ, क्यों जी, क्या यह अच्छा हो जायगा?
“राखाल चिढ़ता है, मेरी अवस्था समझता तो है नहीं। कभी कभी दिल में आता है, यहाँ से जाय, तो चला जाय – परन्तु फिर माँ से कहता हूँ, माँ कहाँ जायगा? – कहाँ जलने-मरने जाय?
“मेरी बालक जैसी अधीर अवस्था आज नयी थोड़े ही है? मथुर बाबू को नाड़ी दिखाता था, पूछता, क्यों जी, मुझे कोई बीमारी हो गयी है?
“अच्छा, तो फिर ईश्वर पर निष्ठा कहाँ रही? जब मैं उस देश को* जा रहा था, तब बैलगाड़ी के पास डाकुओं की तरह लाठी लिये हुए कुछ आदमी आये। मैं देवताओं के नाम लेने लगा। परन्तु कभी कहता था राम राम, कभी दुर्गा दुर्गा, कभी ॐ तत् सत् –
* उनकी जन्मभूमि कामारपुकुर को