श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ फरवरी १८८४ परिच्छेद ७६ ४४७
भी नहीं पढ़ा?' 'जी नहीं।'
"पण्डितजी बड़े गर्व से बातचीत कर रहे हैं, दूसरा चुपचाप बैठा है कि इतने में जोरों की आँधी आयी – नाव डूबने लगी। उस आदमी ने पूछा, 'पण्डितजी, आप तैरना जानते हैं?' पण्डितजी ने कहा, 'नहीं।' उसने कहा, मैंने दर्शन-फर्शन तो नहीं पढ़ा पर तैरना जानता हूँ!' "
ईश्वर ही वस्तु और सब अवस्तु। लक्ष्य-भेद
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अनेकानेक शास्त्रों के ज्ञान से क्या होगा? भवनदी किस तरह पार की जाती है, यही जानना आवश्यक है। ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु।
"लक्ष्य-भेद के समय द्रोणाचार्य ने अर्जुन से पूछा था, 'तुम क्या देख रहे हो? – क्या तुम इन राजाओं को देख रहे हो?' अर्जुन ने कहा – 'नहीं।' 'मुझे देख रहे हो?' 'नहीं।' 'पेड़ देख रहे हो?' 'नहीं।' 'पेड़ पर पक्षी देख रहे हो?' 'नहीं।' 'तो क्या देख रहे हो?' 'बस पक्षी की आँख, जिसे भेदना है।'
"जो केवल पक्षी की आँख देखता है, वही लक्ष्य-भेद कर सकता है।
"जो देखता है, ईश्वर ही वस्तु है और सब अवस्तु हैं, वही चतुर है। अन्य खबरों से हमें क्या काम है? हनुमान ने कहा था, 'मैं तिथि और नक्षत्र, यह सब कुछ नहीं जानता। मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया करता हूँ।'
(मास्टर से) "यहाँ के लिए पंखे मोल ले दो।
(मणिलाल से) "ए जी, तुम एक बार इनके (मास्टर के) बाप के पास जाना। भक्त को देखकर उद्दीपना होगी।"
(२)
मणिलाल आदि को उपदेश। नरलीला
श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे हैं। मणिलाल आदि भक्तगण जमीन पर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण की मधुर बातें सुन रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – "इस हाथ के टूटने के बाद से एक बड़ी विचित्र अवस्था हो रही है। केवल नर-लीला अच्छी लगती है।
"नित्य और लीला। नित्य – अर्थात् वही अखण्ड सच्चिदानन्द।
"लीला – ईश्वर-लीला, देव-लीला, नर-लीला, संसार-लीला।
"वैष्णवचरण कहता था कि नर-लीला पर विश्वास होने से पूर्ण ज्ञान हो जाता है। तब उसकी बात मैं न सुनता था। अब देखता हूँ, ठीक है। वैष्णवचरण मनुष्य की तस्वीरें देखकर जिनमें कोमल भाव, प्रेम-भाव पाता था, उन्हें पसन्द करता था।