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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 486

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ९ मार्च १८८४ | परिच्छेद ७७ | ४६३

“ब्रह्ममय देखता है इसलिए पिशाच की तरह है। पवित्रता-अपवित्रता का ख्याल नहीं रहता। सम्भव है कि शौच करते बेर खा रहा हो – बालक की तरह। स्वप्नदोष के बाद अशुद्धि नहीं समझता है, – समझता है, वीर्य से ही शरीर बना है।

“विष्ठा-मूत्र का ज्ञान नहीं है। सब ब्रह्ममय। भात-दाल बहुत दिनों तक रख देने से विष्ठा की तरह बन जाता है।

“फिर उन्माद के समान; उसकी चाल-ढाल देखकर लोग उसे पागल समझते हैं। और फिर कभी बालक की तरह; लज्जा, घृणा, संकोच आदि कोई बन्धन नहीं रहता।

“ईश्वर-दर्शन के बाद यह स्थिति होती है। जैसे चुम्बक पहाड़ के पास होकर जाने से जहाज के स्क्रू-कील-काँटे सब ढीले होकर छूट जाते हैं। ईश्वर-दर्शन के बाद काम, क्रोध आदि नहीं रह जाते।

“माँ काली के मन्दिर पर जब बिजली गिरी थी, तो हमने देखा था, सभी स्क्रू के माथे उड़ गये थे।

“जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है, उनसे फिर बच्चा पैदा करना अथवा सृष्टि का काम नहीं होता। धान बोने से पौधा होता है, परन्तु धान उबाल कर बोने से उससे पौधा नहीं होता है।

“जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है उनका ‘मैं’ केवल नाम का ही रह जाता है। उस ‘मैं’ द्वारा कोई अनुचित कार्य नहीं होता, सिर्फ नाम को रह जाता है।

“मैंने केशव सेन से कहा, ‘मैं’ को त्याग दो – मैं – कर्ता हूँ – मैं लोगो को शिक्षा दे रहा हूँ – इस ‘मैं’ को। केशव ने कहा, ‘महाशय, तो फिर दल नहीं रहता!’ मैंने कहा, बुरे ‘मैं’ को त्याग दो।

“ ‘ईश्वर का दास मैं’ ‘ईश्वर का भक्त मैं’ इसे त्यागना नहीं पड़ेगा। ‘बुरा मैं’ मौजूद है, इसीलिए ‘ईश्वर का मैं’ नहीं रहता।

“यदि कोई भण्डारी रहे तो मकान का मालिक भण्डार का भार स्वयं नहीं लेता।”।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – देखो इस हाथ में चोट लगने के कारण मेरा स्वभाव बदलता जा रहा है। अब मनुष्य में ईश्वर का अधिक प्रकाश दिखायी दे रहा है। मानो वे कह रहे हैं, मेरा मनुष्यों में वास है, तुम मनुष्यों के साथ आनन्द करो।

“वे शुद्ध भक्तों में अधिक प्रकट हैं – इसीलिए तो मैं नरेन्द्र, राखाल आदि के लिए इतना व्याकुल होता हूँ।

“तालाब के किनारे पर छोटे छोटे गढ़े रहते हैं, उन्हीं में मछलियाँ, केकड़े आकर इकट्ठे हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य में ईश्वर का प्रकाश अधिक है।

“ऐसा है कि शालग्राम से भी मनुष्य बड़ा है; नर ही नारायण हैं।

“प्रतिमा में उनका आविर्भाव होता है और भला मनुष्य में नहीं होगा?

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