श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २३ मार्च, १८८४
भीतर एक नयी नाड़ी होती है; उसका नाम है मेधानाड़ी। उस नाड़ी के होने पर सब स्मरण रहता है – आदमी सब जान सकता है।
“वीर्यपात से बल का क्षय होता है। स्वप्नदोष से जो कुछ निकल जाता है, उसमें दोष नहीं। ऐसा खाद्य पदार्थ के गुण से होता है। इस तरह निकल जाने पर भी जो कुछ रहता है, उसी से काम होता है। फिर भी स्त्री-प्रसंग हरगिज न करना चाहिए।
“अन्त में जो कुछ रहता है वह refine (सार पदार्थ) है। लाहा बाबू के यहाँ राब के घड़े रखे थे। घड़ों के नीचे एक एक छेद करके फिर एक साल बाद जब देखा, तब सब दाने बँध गये थे – मिश्री की तरह। जितना सीरा निकलना था, सब छेद से निकल गया था।
“स्त्रियों का सम्पूर्ण त्याग संन्यासियों के लिए है। तुम लोगों का विवाह हो गया है, कोई दोष नहीं है।
“संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। पर साधारण लोगों के लिए यह सम्भव नहीं है। सा, रे, ग, म, प, ध, नि; ‘नि’ में तुम्हारी आवाज बहुत देर तक नहीं रह सकती।
“संन्यासी के लिए वीर्यपात बहुत ही बुरा है; इसीलिए उन्हें सावधानी से रहना पड़ता है, ताकि स्त्रियाँ दृष्टि में भी न पड़ें। भक्त-स्त्री होने पर भी वहाँ से हट जाना चाहिए। स्त्री-रूप देखना भी बुरा है। जाग्रत अवस्था में चाहे न हो पर स्वप्न में अवश्य वीर्य-स्खलन हो जाता है।
“संन्यासी जितेन्द्रिय होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए स्त्रियों के साथ उसे बातचीत न करनी चाहिए। भक्त-स्त्री होने पर भी उससे ज्यादा देर तक बातचीत न करे।
“संन्यासी की है निर्जला एकादशी। एकादशी और दो तरह की है। एक फलमूल खाकर रखी जाती है, एक पूड़ी-कचौड़ी और मालपुए खाकर। (सब हँसते हैं।)
“कभी तो ऐसा भी होता है कि उधर पूड़ियाँ उड़ रही हैं और इधर दूध में दो-एक रोटियाँ भी भीग रही हैं, फिर खायेंगे! (सब हँसते हैं।)
(हँसते हुए) “तुम लोग निर्जला एकादशी न रख सकोगे।
“कृष्णकिशोर को मैंने देखा, एकादशी के दिन पूड़ियाँ और पकवान उड़ा रहे थे। मैंने हृदय से कहा, हृदय, मेरी इच्छा होती है कि मैं भी कृष्णकिशोर की एकादशी रखूँ। (सब हँसते हैं।) एक दिन ऐसा ही किया भी। खूब कसकर खाया। परन्तु उसके दूसरे दिन फिर कुछ न खाया गया।” (सब हँसते हैं।)
जो भक्त पंचवटी में हठयोगी को देखने गये थे, वे लौटे। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “क्यों जी, कैसा देखा? अपने गज से तो नापा ही होगा?” श्रीरामकृष्ण ने देखा, भक्तों में कोई भी हठयोगी को रुपये देने के लिए राजी नहीं है।