श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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| ४७८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ अप्रैल, १८८४ |
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एक पात्र है जिसमें मन-बुद्धि-अहंकार रूपी पानी है। ब्रह्म सूर्य-स्वरूप हैं। इस पानी में उनका प्रतिबिम्ब गिर रहा है। भक्त ईश्वर का वही रूप देखता है।
“वेदान्त के मत से ब्रह्म ही वस्तु है और सब माया, स्वप्नवत्, अवस्तु। अहं-रूपी एकै लाठी सच्चिदानन्द-समुद्र में पड़ी हुई है। (मास्टर से) तुम इसे सुनते जाना - अहं-लाठी को उठा लेने पर एक सच्चिदानन्द-समुद्र रह जाता है। अहं-लाठी के रहने से दो दीख पड़ते हैं। इधर पानी का एक हिस्सा और उधर एक हिस्सा। ब्रह्मज्ञान होने पर मनुष्य को समाधि हो जाती है। तब यह अहं मिट जाता है।
“परन्तु लोक-शिक्षा के लिए शंकराचार्य ने 'विद्या का अहं' रखा था। (प्राणकृष्ण से) परन्तु ज्ञानियों का एक लक्षण और भी है। कोई कोई सोचते है, 'मैं ज्ञानी हो गया।' ज्ञान का लक्षण क्या है? ज्ञानी किसी की बुराई नहीं कर सकता। वह बालक-सा हो जाता है। लोहे के खड्ग में अगर पारस-पत्थर छुआ दिया जाय तो खड्ग सोने का हो जाता है। सोने से हिंसा का काम नहीं होता। बाहर से भले ही जान पड़ता हो कि इसमें राग-अहंकार है, परन्तु वास्तव में ज्ञानी में यह कुछ नहीं रहता।
“दूर से जली रस्सी देखिये तो जान पड़ता है कि यह रस्सी ही पड़ी हुई है, परन्तु पास जाकर फूँक मारिये तो सब राख होकर उड़ जाती है। क्रोध का, अहंकार का बस आकार मात्र है, परन्तु वह यथार्थ में क्रोध नहीं - अहंकार नहीं।
“बच्चे में आसक्ति नहीं रहती। अभी अभी उसने घरौंदा बनाया। कोई उसे छू ले तो तिनककर नाचने लगे, रोना शुरू कर दे, परन्तु खुद ही थोड़ी देर में उसे बिगाड़ डालता है। अभी अभी देखो तो कपड़े पर रीझ है। कहता है, मेरे बाबूजी ने ले दिया है, मैं नहीं दूँगा; परन्तु एक खिलौना दो; बस भूल जाता है, कपड़े को वहीं छोड़कर चला जाता है।
“ये ही सब ज्ञानी के लक्षण हैं। चाहे घर में बड़ा ऐश्वर्य हो - शीशे, मेज, तस्वीरें, गाड़ी-घोड़े, परन्तु दिल में आ जाय तो सब छोड़-छाड़कर काशी की राह पकड़ ले।
“वेदान्त के मत से जागरण अवस्था भी कुछ नहीं है। किसी लकड़हारे ने स्वप्न देखा था। कच्ची नींद में ही किसी दूसरे के जगा देने पर उसने झुँझलाकर कहा - 'तूने क्यों मुझे कच्ची नींद में जगाया? मैं राजा हो गया था और सात लड़कों का बाप। मेरे बच्चे लिखते-पढ़ते थे, अस्त्रविद्या सीख रहे थे। मैं सिंहासन पर बैठा राज कर रहा था। क्यों मेरा सब्ज-बाग उजाड़ डाला?' उस आदमी ने कहा - 'अरे वह तो स्वप्न था, उसमें क्या रखा है?' लकड़हारे ने कहा, 'चल, तू नहीं समझा। मेरा लकड़हारा होना जिस तरह सच है, स्वप्न में राजा होना उसी तरह सच है। लकड़हारा होना यदि सत्य हो तो स्वप्न में राजा होना भी सत्य है।”
अब श्रीरामकृष्ण विज्ञानी की बात कह रहे हैं -
“नेति-नेति करके आत्म-साक्षात्कार करने को ज्ञान कहते हैं। नेति-नेति विचार
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