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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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५२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २० जून, १८८४.

पर फिर सहज ही नहीं छोड़ते। बिलकुल अच्छे हो जाने पर छोड़ते हैं।

“यहाँ जो भक्त आते हैं, उनके दो दर्जे हैं। जो एक दर्जे के हैं वे कहते हैं, ‘हे ईश्वर, हमारा उद्धार करो।’ दूसरे दर्जेवाले अन्तरंग हैं, वे यह बात नहीं कहते। दो बातें जानने से ही उनकी बन जाती है। एक तो यह कि मैं (श्रीरामकृष्ण) कौन हूँ, दूसरी यह कि वे कौन हैं - मुझसे उनका क्या सम्बन्ध है।

“तुम इस श्रेणी के हो। नहीं तो और कोई क्या इतना कर सकता था!

“भवनाथ, बाबूराम का प्रकृतिभाव है। हरीश स्त्रियों का कपड़ा पहनकर सोता है। बाबूराम ने भी कहा है, मुझे वही भाव अच्छा लगता है। बस मिल गया। यही भाव भवनाथ का भी है। नरेन्द्र, राखाल, निरंजन, इन लोगों का पुरुष-भाव है।

“अच्छा, हाथ टूटने का क्या अर्थ है? पहले एक बार भावावस्था में दाँत टूट गया था। अबकी बार भावावस्था में हाथ टूट गया।”

मणि को चुपचाप बैठे देखकर श्रीरामकृष्ण आप ही आप कह रहे हैं -

“हाथ टूटा सब अहंकार निर्मूल करने के लिए। अब भीतर ‘मैं’ कहीं खोजने पर भी नहीं मिलता। खोजने को जब जाता हूँ तो देखता हूँ वे हैं। पूर्ण रूप से अहंकार नष्ट हुए बिना उन्हें कोई पा नहीं सकता।

“चातक को देखो, मिट्टी में रहता है, पर कितने ऊँचे पर चढ़ता है।

“कभी-कभी देह काँपने लगती है कि कहीं विभूतियाँ न आ जायँ। इस समय अगर विभूतियों का आना हुआ तो यहाँ अस्पताल-दवाखाने खुल जायेंगे। लोग आकर कहेंगे, मेरी बीमारी अच्छी कर दो। क्या विभूतियाँ अच्छी होती हैं?”

मास्टर – जी नहीं, आपने तो कहा है, आठ विभूतियों में से एक के भी रहने पर ईश्वर नहीं मिल सकते।

श्रीरामकृष्ण – बिलकुल ठीक, जो हीनबुद्धि हैं वे ही विभूतियाँ चाहते हैं।

“जो आदमी बड़े आदमी के पास कुछ प्रार्थना कर बैठता है, उसकी फिर खातिरदारी नहीं होती, उसे फिर एक ही गाड़ी पर, बड़े आदमी के साथ चढ़ने का सौभाग्य नहीं होता; यदि उसे वह चढ़ाता भी है, तो पास बैठने नहीं देता। इसीलिए निष्काम भक्ति, अहैतुकी भक्ति सब से अच्छी होती है।

साकार निराकार दोनों ही सत्य हैं

“अच्छा, साकार और निराकार दोनों सत्य हैं - क्यों? निराकार में मन अधिक देर तक नहीं रहता, इसीलिए भक्त साकार को लेकर रहते हैं।

“कप्तान ठीक कहता है, चिड़िया ऊपर उड़ती हुई जब थक जाती है, तब फिर डाल पर आकर विश्राम करती है। निराकार के बाद साकार।