श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३२ श्रीरामाकृष्णवचनामृत २५ जून, १८८४
श्रीरामकृष्ण ने नरेन्द्र को किसी काम में लगा देने के लिए ईशान आदि भक्तों से कह रखा है। ईशान Controller General (कंट्रोलर जनरल) के आफिस में कर्मचारियों के एक अध्यक्ष थे। नरेन्द्र के घर की तकलीफ सुनकर श्रीरामकृष्ण सदा ही चिन्तित रहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – (नरेन्द्र से) – मैने ईशान से तेरे लिए कहा है। ईशान एक दिन वहाँ (दक्षिणेश्वर में) रहा था, तभी मैंने उससे तेरी बात कही थी। बहुतों के साथ उसका परिचय है।
ईशान ने श्रीरामकृष्ण को निमन्त्रण देकर बुलाया है। इस उपलक्ष्य में अपने कई दूसरे मित्रों को भी न्योता भेजा है। गाना होगा; पखावज, तबला और तानपूरे का इन्तजाम किया जा रहा है। घर से एक आदमी थोड़ा सा मैदा दे गया। (पखावज में लगाने के लिए।) ग्यारह बजे का समय होगा। ईशान की इच्छा है कि नरेन्द्र गावें।
श्रीरामकृष्ण – (ईशान से) – इस समय मैदा! तो अभी भोजन को बड़ी देर होगी?
ईशान – (सहास्य) – जी नहीं, ऐसी कुछ देर नहीं है।
भक्तों में कोई-कोई हँस रहे हैं, भागवत के पण्डित भी हँसकर एक संस्कृत श्लोक कह रहे हैं। श्लोक की आवृत्ति हो जाने पर पण्डितजी उसकी व्याख्या कर रहे हैं। कहते हैं, दर्शन आदि शास्त्रों से काव्य मनोहर है। जब काव्य का पाठ होता है, लोग उसे सुनते हैं, तब वेदान्त, सांख्य, न्याय, पातंजलि, ये सब रूखे जान पड़ते हैं। काव्य की अपेक्षा गीत मनोहर है। संगीत को सुनकर पाषाण-हृदयों का भी हृदय द्रवित हो जाता है। यद्यपि गीतों में इतना आकर्षण होता है, तथापि सुन्दरी स्त्री की तुलना में वह कम है। यदि एक सुन्दरी स्त्री यहाँ से निकल जाय तो न किसी का मन काव्य में लगेगा, न कोई गीत ही सुनेगा। सब के सब उसी स्त्री को देखने लगेंगे। और जब भूख लगती है, तब काव्य, गीत, नारी, कुछ भी अच्छा नहीं लगता अन्नचिन्ता चमत्कारा!
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – ये रसिक हैं।
पखावज बँध गया, नरेन्द्र गा रहे हैं। गाना शुरू होने से कुछ पहले ही श्रीरामकृष्ण ऊपर के बैठकखाने में विश्राम करने के लिए चले गये। साथ मास्टर और श्रीश भी गये। यह बैठकखाना रास्ते के ऊपर है। मास्टर ने श्रीरामकृष्ण से श्रीश का परिचय कराया। कहा, ये पण्डित हैं और प्रकृति के बड़े शान्त हैं। बचपन से ही ये मेरे साथ पढ़ते थे। अब ये वकालत करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – इस तरह के आदमी भी वकालत करें!
मास्टर – भूलकर उस रास्ते में चले गये हैं।
श्रीरामकृष्ण – मैंने गणेश वकील को देखा है। वहाँ (दक्षिणेश्वर में) बाबुओं के साथ कभी-कभी जाता है। पन्ना (वकील) भी जाता है – सुन्दर तो नहीं है, पर गाता अच्छा है। मुझे मानता भी खूब है, बड़ा सरल है। (श्रीश से) आपने किसे सार-वस्तु सोचा?