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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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५३६श्रीरामकृष्णवचनामृत२५ जून, १८८४

फिर शशधर की ओर देखकर कहने लगे – “भैया, कुछ और बल बढ़ाओ, कुछ दिन और साधन-भजन करो। पेड़ पर अभी चढ़े नहीं और अभी से फल की आकांक्षा! परन्तु लोगों के भले के लिए तुम यह सब कर रहे हो।”

इतना कहकर श्रीरामकृष्ण शशधर को सिर झुकाकर नमस्कार कर रहे हैं। फिर कहने लगे –

“जब पहले-पहल मैंने तुम्हारी बात सुनी, तो लोगों से पूछा, सिर्फ पण्डित है या कुछ विवेक-वैराग्य भी है?

“जिस पण्डित के विवेक नहीं, वह पण्डित ही नहीं।

“अगर आदेश मिला हो तो लोक-शिक्षा में दोष नहीं। आदेश पाने पर अगर कोई लोक-शिक्षा देता है, तो फिर उसे कोई पराजित नहीं कर सकता।

“सरस्वती के पास से अगर एक भी किरण आ जाय तो ऐसी शक्ति हो जाती है कि बड़े-बड़े पण्डित भी सिर झुका लेते हैं।

“दिया जलाने पर, झुण्ड के झुण्ड कीड़े इकट्ठे हो जाते हैं, उन्हें बुलाना नहीं पड़ता। उसी तरह जिसे आदेश मिला है, उसे आदमियों को बुलाना नहीं पड़ता। अमुक समय में लेक्चर होगा, यह कहकर खबर नहीं भेजनी पड़ती; उसी में आकर्षण होता है और इतना कि आदमी आप खिंचकर आ जाते हैं। तब राजा, बाबू, सभी स्वयं ही दल बाँध-बाँधकर उसके पास आते हैं और कहते रहते हैं, ‘आपको क्या चाहिए? आम, सन्देश, रुपया, पैसा, दुशाले, यह सब ले आया हूँ, आप क्या लीजियेगा?’ मैं उन आदमियों से कहता हूँ, ‘दूर करो, यह कुछ मुझे अच्छा नहीं लगता, मैं कुछ नहीं चाहता।’

“चुम्बक-पत्थर क्या लोहे से कहेगा कि मेरे पास आओ? कहना नहीं होता। लोहा आप ही चुम्बक-पत्थर के आकर्षण से आ जाता है।

“सच है कि इस तरह का आदमी पण्डित नहीं होता; परन्तु इसलिए यह न सोच लेना कि उसके ज्ञान में कुछ कमी है। कहीं किताबें पढ़कर भी ज्ञान होता है? जिसे आदेश मिला है उसके ज्ञान का अन्त नहीं है। वह ज्ञान ईश्वर के पास से आता है। वह कभी चुकता नहीं। उस देश में धान नापते समय एक आदमी नापता है और दूसरा राशि ठेलता जाता है। उसी तरह जो आदेश पाता है, वह जितनी ही लोक-शिक्षा देता रहता है, माँ उसकी ज्ञान की राशि पूरी करती जाती है; उस ज्ञान का अन्त नहीं होता। मेरी अवस्था इसी प्रकार की है।

“माँ यदि एक बार भी कृपा की दृष्टि फेर दें तो क्या फिर ज्ञान का अभाव रह सकता है? इसीलिए पूछ रहा हूँ, तुम्हें कोई आदेश मिला है या नहीं।”

हाजरा – हाँ, आदेश अवश्य मिला होगा। क्यों महाशय?

पण्डितजी – नहीं, आदेश तो विशेष कुछ नहीं मिला।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar