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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 589
५६६श्रीरामकृष्णवचनामृत३ जुलाई, १८८४

हो या मौसा?

"परमहंसों का चाल-चलन भी बालकों का-सा होता है; कोई हिसाब नहीं रहता कि कहाँ जायें। सब ब्रह्ममय देखते हैं। कहाँ जा रहे हैं, कहाँ चल रहे हैं, कुछ हिसाब नहीं। रामलाल का भाई हृदय के यहाँ दुर्गापूजा देखने गया था। हृदय के यहाँ से आप ही आप किसी तरफ चला गया। किसी को इसका पता भी न चला। चार वर्ष के लड़के को देखकर लोग पूछने लगे, तू कहाँ से आ रहा है? वह कुछ न कह सकता था। उसने सिर्फ कहा – चाला* अर्थात् जिस आठ चाले में पूजा हो रही है। जब लोगों ने पूछा, तू किसके यहाँ से आ रहा है? तब उसने कहा – दादा।

"परमहंसों की पागलों की-सी अवस्था भी होती है। दक्षिणेश्वर की मन्दिर-प्रतिष्ठा के कुछ दिन बाद एक पागल आया था। वह पूर्ण ज्ञानी था – फटे जूते पहने था, एक हाथ में बांस की एक कमची लिये था और दूसरे में गमले में लगा हुआ एक आम का पौधा। गंगा में डुबकी मारकर उठा, न सन्ध्या, न पूजन; कपड़े में कुछ लिये हुए था, वही खाने लगा। फिर कालीमन्दिर में जाकर स्तव करने लगा। मन्दिर काँप उठा था! हलधारी उस समय मन्दिर में था। अतिथिशाला में लोगों ने उसे खाने को नहीं दिया था, परन्तु उसने जरा भी परवाह नहीं की। जूठी पत्तलें खींच खींचकर उनमें जो कुछ लगा था, वही खाने लगा; जहाँ कुत्ते खा रहे थे वहीं कभी-कभी कुत्तों को हटाकर खाता था। कुत्तों ने उसका कुछ नहीं किया। हलधारी उसके पीछे-पीछे गया था। पूछा – 'तुम कौन हो? क्या तुम पूर्ण ज्ञानी हो?' तब उसने कहा था – 'मैं पूर्ण ज्ञानी हूँ! चुप!!'

"मैंने हलदारी से जब ये सब बातें सुनीं, मेरा कलेजा दहलने लगा, मैं हृदय से लिपट गया। माँ से कहा – 'माँ, तो क्या वही अवस्था मेरी भी होगी?' हम लोग उसे देखने गये। हम लोगों से खूब ज्ञान की बातें करता था, दूसरे आदमी आते तो वही पागलपन शुरू कर देता था। जब वह गया, तब हलधारी बहुत दूर तक उसके साथ गया था। फाटक पार करते समय उसने हलधारी से कहा था, 'तुझे मैं क्या कहूँ? जब तलैया और गंगाजी के पानी में भेद-बुद्धि न रह जाय, तब समझना कि पूर्ण ज्ञान हुआ।' इतना कहकर उसने अपना सीधा रास्ता पकड़ा।"

पाण्डित्य की अपेक्षा तपस्या का प्रयोजन। साधना

श्रीरामकृष्ण मास्टर से बातचीत कर रहे हैं। पास ही भक्तगण भी बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – शशधर को तुम क्या समझते हो?

मास्टर – जी, बहुत अच्छा।


* बड़े बड़े छप्परों से छाये हुए बंगले को बंगाल में 'आठ चाला' अर्थात् आठ चालियों या छप्परोंवाला मकान कहते हैं।

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