श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३ जुलाई, १८८४ | परिच्छेद ८६ | ५७३
पण्डितजी जानेवाले हैं। श्रीरामकृष्ण ने कहा, इनके लिए गाड़ी मँगवा दो।
पण्डितजी – जी नहीं, हम लोग ऐसे ही चले जायेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कभी ऐसा भी हो सकता है? – 'ब्रह्मा भी तुम्हें ध्यान में नहीं पाते'।
पण्डितजी – अभी जाने की कोई जरूरत न थी, परन्तु सन्ध्या अभी करनी है।
श्रीरामकृष्ण – “माँ की इच्छा से मेरे सन्ध्यादि कर्म छूट गये हैं। सन्ध्यादि के द्वारा देह और मन की शुद्धि की जाती है। वह अवस्था अब नहीं।” यह कहकर श्रीरामकृष्ण ने गाने के एक चरण की आवृत्ति की।
(भावार्थ) “शुचिता और अशुचिता के साथ दिव्यभवन में तू कब सोयेगा? उन दोनों सौतों में जब प्रीति होगी तभी तू श्यामा माँ को पा सकेगा।”
पण्डित शशधर प्रणाम करके बिदा हुए।
राम – कल मैं शशधर के पास गया था, आपने कहा था।
श्रीरामकृष्ण – कहाँ, मैंने तो नहीं कहा; परन्तु तुम गये तो अच्छा किया।
राम – एक संवाद-पत्र (Indian Empire) का संपादक आपकी निन्दा कर रहा था।
श्रीरामकृष्ण – तो इससे क्या हुआ, की होगी।
राम – और भी तो सुनिये। मुझसे आपकी बात सुनकर मुझे छोड़ता ही न था, आपकी बात और सुनना चाहता था।
प्रताप अब भी बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण ने उनसे कहा, वहाँ एक बार जाना, भुवन ने कहा है, भाड़ा दूँगा।
शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण जगज्जननी का नाम ले रहे हैं। कभी राम नाम करते हैं, कभी कृष्णनाम, कभी हरिनाम। भक्तगण चुपचाप सुन रहे हैं। इतने मधुर कण्ठ से नाम ले रहे हैं, जैसे मधु की वर्षा हो रही हो। आज बलराम का मकान नवद्वीप हो रहा है। बाहर नवद्वीप और भीतर वृन्दावन।
आज रात को ही श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर जायेंगे। बलराम उन्हें अन्तःपुर में लिये जा रहे हैं, जलपान कराने के लिए। इस सुयोग में स्त्रियाँ भी उनके दर्शन कर लेंगी।
इधर बाहर के बैठकखाने में भक्तगण उनकी प्रतीक्षा करते हुए एक साथ कीर्तन करने लगे। श्रीरामकृष्ण भी बाहर आकर उनके साथ मिल गये। खूब कीर्तन होने लगा।
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