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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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४०श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

“तुम्हारा कर्म सात्त्विक कर्म है। यह सत्त्व का रजस् है। सत्त्वगुण से दया होती है। दया से जो कर्म किया जाता है, वह है तो राजसिक कर्म सही, पर यह रजोगुण सत्त्व का रजोगुण है, इसमें दोष नहीं है। शुकदेव आदि ने लोकशिक्षा के लिए दया रख ली थी – ईश्वर के विषय में शिक्षा देने के लिए। तुम विद्यादान और अन्नदान कर रहे हो – यह भी अच्छा है। निष्काम रीति से कर सको तो इससे ईश्वर-लाभ होगा। कोई करता है नाम के लिए, कोई पुण्य के लिए – उनका कर्म निष्काम नहीं।

“फिर सिद्ध तो तुम हो ही।”

विद्यासागर – महाराज, यह कैसे?

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – आलू-परवल सिद्ध होने से (पक जाने से) नरम हो जाते हैं – सो तुम भी बहुत नर्म हो। तुम्हारी ऐसी दया! (हास्य)

विद्यासागर (सहास्य) – पीसा उरद तो सिद्ध होने पर सख्त हो जाता है। (सब हँसे।)

श्रीरामकृष्ण – तुम वैसे क्यों होने लगे? खाली पण्डित कैसे हैं – मानो एक पके फल का अंश जो अन्त तक कठिन ही रह जाता है। वे न इधर के हैं न उधर के। गीध खूब ऊँचा उड़ता है, पर उसकी नजर हड़वार पर ही रहती है। जो खाली पण्डित हैं, वे सुनने के ही हैं, पर उनकी कामिनी-कांचन पर आसक्ति होती है – गीध की तरह वे सड़ी लाशें ढूँढ़ते हैं। आसक्ति का घर अविद्या के संसार में है। दया, भक्ति, वैराग्य – ये विद्या के ऐश्वर्य हैं।

विद्यासागर चुपचाप सुन रहे हैं। सभी टकटकी बाँधे इस आनन्दमय पुरुष को देख रहे हैं, उनका वचनामृत पान कर रहे हैं।

(३)

श्रीरामकृष्ण : ज्ञानयोग अथवा वेदान्त-विचार

विद्यासागर बड़े विद्वान् हैं। जब संस्कृत कालेज में पढ़ते थे तब अपनी श्रेणी के सब से अच्छे छात्र थे। हरएक परीक्षा में प्रथम होते और स्वर्णपदक आदि अथवा छात्रवृत्तियाँ पाते थे। होते होते वे संस्कृत कालेज के प्रधान अध्यापक तक हुए थे। संस्कृत व्याकरण तथा काव्य में उन्होंने विशेष ज्ञान प्राप्त किया था। स्वयं के प्रयत्न से अंग्रेजी सीखी थी।

विद्यासागर किसी को धर्मशिक्षा नहीं देते थे। वे दर्शनादि ग्रन्थ पढ़ चुके थे। मास्टर ने एक दिन उनसे पूछा, “आपको हिन्दू दर्शन कैसे लगते हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “मुझे यही मालूम होता है कि वे जो चीज समझाने गए उसे समझा न सके।” वे हिन्दुओं की भाँति श्राद्धादि सब धर्मानुष्ठान करते थे, गले में जनेऊ धारण करते थे, अपनी भाषा में जो पत्र लिखते थे, उनमें सब से पहले “श्रीश्रीहरिः शरणम्” यह ईश्वरवन्दनात्मक

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