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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 633
६१०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

श्रीयुत महेन्द्र मुखर्जी तीर्थ-यात्रा करनेवाले हैं? श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं -

(सहास्य) “यह कैसी बात! प्रेम के अंकुर के उगते ही जा रहे हो? अंकुर होगा, फिर पेड़ होगा, तब फल होंगे। तुम्हारे साथ अच्छी बातें हो रही थीं।”

महेन्द्र - जी, जरा इच्छा हुई है, घूम लूँ। फिर जल्द ही आ जाऊँगा।

(४)

भक्तों के संग में

तीसरा पहर ढल गया है। दिन के पाँच बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण उठे। भक्तगण बगीचे में टहल रहे हैं। उनमें से कितने ही शीघ्र घर जाने वाले हैं।

श्रीरामकृष्ण उत्तरवाले बरामदे में हाजरा से बातचीत कर रहे हैं। नरेन्द्र आजकल गुहों के बड़े लड़के अन्नदा के पास प्रायः जाया करते हैं।

हाजरा - सुना है, गुहों का लड़का आजकल कठोर साधना कर रहा है। भोजन भी थोड़ा सा ही करता है। चार दिन बाद अन्न खाता है।

श्रीरामकृष्ण - कहते क्या हो! ‘कौन कहे किस भेष से नारायण मिल जाय।’

हाजरा - नरेन्द्र ने स्वागत-गीत गाया था।

श्रीरामकृष्ण - (उत्सुकता से) - कैसा?

किशोर पास खड़ा था।

श्रीरामकृष्ण - तेरी तबियत अच्छी है न?

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में खड़े हैं। शरत् काल है। फलालैन का गेरुआ कुर्ता पहने हैं और नरेन्द्र से कह रहे हैं - “तूने स्वागत-गीत गाया था?” गोल बरामदे से उतरकर श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र के साथ गंगा के बाँध पर आये। साथ मास्टर हैं। नरेन्द्र गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण खड़े हुए सुन रहे हैं। सुनते सुनते उन्हें भावावेश हो रहा है।

अब भी दिन कुछ शेष है। सूर्य भगवान पश्चिम की ओर अभी कुछ दीख पड़ रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में डूबे हुए हैं। एक ओर गंगा उत्तर की ओर बही जा रही हैं। अभी कुछ देर से ज्वार का आना शुरू हुआ है। पीछे फुलवाड़ी है। दाहिनी ओर नौबत और पंचवटी दिखायी दे रही हैं। पास में नरेन्द्र खड़े हुए गा रहे हैं। शाम हो गयी।

नरेन्द्र आदि भक्त प्रणाम करके बिदा हो गये। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आये। जगन्माता का स्मरण-चिन्तन कर रहे हैं। श्रीयुत यदु मल्लिक पासवाले बगीचे में आज आये हुए हैं। बगीचे में आने पर प्रायः आदमी भेजकर श्रीरामकृष्ण को बुलवा ले जाते हैं। आज भी आदमी भेजा है - श्रीरामकृष्ण जायेंगे। श्रीयुत अधर सेन कलकत्ते से आये और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण श्रीयुत यदु मल्लिक के बगीचे में जायेंगे। लाटू से कह रहे हैं -