श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६१३
चढ़ने के लिए चलती नाव किराये पर लेने की बातचीत की थी! (सब हँसते हैं।)
"पहले ईश्वर की बातें कुछ-कुछ सुनता था। अब वह नहीं दीख पड़ता। कुछ खुशामदी लोग यदु के दाँये-बाँये हमेशा बने रहते हैं - उन लोगों ने और चकाचौंध लगा दिया है।
"बड़ा हिसाबी है। जाने के साथ ही उसने पूछा, कितना किराया है? मैंने कहा, 'तुम्हारा न सुनना ही अच्छा है। तुम ढाई रुपया देना।' इससे चुप हो गया और वही ढाई रुपये देता है!" (सब हँसते हैं)
रात हो गयी है। अधर जायेंगे, प्रणाम कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण - (मास्टर से) - नारायण को लेते आना।