श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६१५ |
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तब सिर पर हाथ फेरने लगता है।
“कप्तान की स्त्री के दूसरे इष्ट देवता हैं, गोपाल। अब की बार उसे उतनी कंजूसी करते नहीं देखा। वह भी गीता जानती है, कैसी भक्ति है उनकी! – मुझे जहाँ भोजन कराया, वहीं हाथ मुँह भी धुलाया। दाँत खोदने की सींक भी वहीं दी।
“मेरे खा चुकने पर कप्तान या उसकी पत्नी पंखा झलती है।
“उनमें बड़ी भक्ति है। साधुओं का बड़ा सम्मान करते हैं। पश्चिम के आदमियों में साधुओं के प्रति भक्ति ज्यादा है। जंग बहादुर के लड़के और उसके भतीजे कर्नल यहाँ आये थे। जब आये तब पतलून उतारकर मानो बहुत डरते हुए आये।
“कप्तान के साथ उसके देश की एक स्त्री भी आयी थी। बड़ी भक्त थी – विवाह अभी नहीं हुआ था। गीतगोविन्द के गाने कण्ठाग्र थे। द्वारका बाबू आदि उसका गाना सुनने के लिए बैठे थे। जब उसने गीतगोविन्द का गाना गाया तब द्वारका बाबू रूमाल से आँसू पोंछने लगे। विवाह क्यों नहीं किया, इस प्रश्न के पूछने पर उसने कहा – ‘ईश्वर की दास हूँ? और किसकी दासी होऊँगी।’ और सब लोग उसे देवी समझकर बहुत मानते हैं – जैसा पुस्तकों में लिखा हुआ मिलता है।
(महेन्द्रादि से) “आप लोग आते हैं, जब सुनता हूँ कि इससे कुछ उपकार होता है तब मन बहुत अच्छा रहता है। (मास्टर से) यहाँ आदमी क्यों आते हैं? – वैसा पढ़ा-लिखा भी तो नहीं हूँ।”
मास्टर – जी, कृष्ण जब स्वयं सब चरवाहे और गौएँ बन गये (ब्रह्मा के हर लेने पर) तब चरवाहों की माताएँ नये बच्चों को पाकर फिर यशोदा के पास नहीं गयीं।
श्रीरामकृष्ण – इससे क्या हुआ?
मास्टर – ईश्वर स्वयं ही चरवाहे बने थे कि नहीं, इसीलिए उनमें इतना आकर्षण था। ईश्वर की सत्ता रहने से ही मन खिंच जाता है।
श्रीरामकृष्ण – यह योगमाया का आकर्षण था – वह जादू डाल देती है। जटिला के डर से बछड़े को उठाये हुए सुबल का रूप धरकर राधिका जा रही थीं; जब उन्होंने योगमाया की शरण ली तब जटिला ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया।
“हरि की सब लीलाएँ योगमाया की सहायता से हुई थीं।
“गोपियों का प्यार क्या है, परकीया रति है। कृष्ण के लिए गोपियों को प्रेमोन्माद हुआ था। अपने स्वामी के लिए इतना नहीं होता। अगर कोई कहे, ‘अरी तेरा स्वामी आया है’, तो कहती है, ‘आया है तो आये – खुद भोजन कर लेगा।’ परन्तु अगर दूसरे पुरुष की बात सुनती है कि बड़ा रसिक है, बड़ा सुन्दर है और रसपण्डित है तो दौड़कर देखने के लिए जाती हैं – और ओट से झाँककर देखती है।
“अगर कहो कि उन्हें तो हमने देखा ही नहीं फिर गोपियों की तरह उन पर चित्त कैसे