श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६१९
हैं। उसी के भावों में उससे कहा, हरिपद के साथ जैसा चाहो करो; परन्तु बुरा भाव न लाना।
“लड़कों की यह साधना की अवस्था है। इस समय केवल त्याग करना चाहिए। संन्यासियों को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। मैं उनसे कहता हूँ, स्त्री अगर भक्त भी हो तो भी उसके पास बैठकर बातचीत न करनी चाहिए। खड़े होकर चाहे कुछ कह लिया जाय। सिद्ध होने पर भी इसी तरह चलना पड़ता है – अपनी सावधानी के लिए भी और लोकशिक्षा के लिए भी। औरतों के आने पर मैं थोड़ी ही देर में कहता हूँ, तुम लोग जाकर देवताओं के दर्शन करो। इससे भी अगर वे न उठीं तो मैं खुद उठ जाता हूँ। मुझे देखकर दूसरे शिक्षा ग्रहण करेंगे।
“अच्छा, ये जो सब लड़के आ रहे हैं, इसका क्या अर्थ है? और तुम लोग जो आ रहे हो, इसका भी क्या अर्थ है? इसके (अपने को दिखाकर) भीतर कुछ है जरूर, नहीं तो आकर्षण फिर कैसे होता?
“उस देश में जब मैं हृदय के घर में था, मुझे वे लोग श्यामबाजार ले गये थे। मैं समझा, गौरांग के भक्त हैं यहाँ। गाँव में घुसने से पहले ही मुझे माँ ने दिखा दिया – साक्षात् गौरांग! फिर वहाँ इतना आकर्षण हुआ कि सात दिन और सात रात लोगों की भीड़ लगी रही। सदा ही कीर्तन और आनन्द मचा हुआ था। इतने आदमी आये कि चार-दीवार और पेड़ों पर भी आदमी चढ़कर बैठे थे।
“मैं नटवर गोस्वामी के यहाँ गया था। वहाँ रातदिन भीड़ लगी रहती। मैं वहाँ से भागकर एक ताँती (जुलाहे) के यहाँ सुबह को बैठा करता था। फिर देखा, थोड़ी ही देर में सब लोग वहाँ भी पहुँच गये थे। सब खोल-करताल ले गये। – फिर ‘तिरकिट्-तिरकिट्’ कर रहे थे। भोजन आदि तीन बजे होता था।
“चारों ओर अफवाह फैल गयी थी कि एक ऐसा आदमी आया है जो सात बार मरकर सातों बार जी उठता है। मुझे सर्दी-गर्मी न हो जाय इस डर से हृदय मुझे बाहर मैदान में घसीट ले जाता था। वहाँ फिर चींटियों की पाँत की तरह आदमी उमड़ चलते थे – फिर वही खोल-करताल और ‘तिरकिट’। हृदय ने खूब फटकारा, कहा – ‘क्या हम लोगों ने कभी कीर्तन सुना नहीं?’
“वहाँ के गोस्वामी झगड़ा करने के लिए आये थे। उन्होंने सोचा था कि ये लोग हमारा चढ़ाव हड़पने के लिए आये हैं। उन्होंने देखा, मैंने एक जोड़ा धोती तो क्या एक ताग सूत भी नहीं लिया। किसी ने कहा ब्रह्मज्ञानी है। इस पर गोस्वामी सब थाह लेने के लिए आये। एक ने पूछा, इनके माला, तिलक क्यों नहीं हैं? उन्हीं में से किसी ने कहा, नारियल का पत्ता आप ही निकलकर गिर गया है। नारियल के पत्तेवाली बात मैंने वहीं सीखी थी। ज्ञान के होने पर उपाधियाँ आप छूट जाती हैं।
“दूर के गाँवों से लोग आकर इकट्ठे होते थे। वे लोग रात को वहीं रहते थे। जिस