भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 677, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 677
६५४श्रीरामकृष्णवचनामृत२८ सितम्बर, १८८४

हैं। इसीलिए इतनी उद्दिपना हो रही है।

श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं –

“सखी री! जिसके लिए मैं पागल हो गयी उसे अभी कहाँ पाया?”

श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं, एकाएक ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर विजय खड़े हो गये। श्रीरामकृष्ण भी भावोन्मत्त होकर विजय आदि भक्तों के साथ नृत्य करने लगे।

(४)

किस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए

कीर्तन हो जाने पर श्रीरामकृष्ण, विजय, नरेन्द्र तथा दूसरे भक्तों ने आसन ग्रहण किया। सब की दृष्टि श्रीरामकृष्ण पर लगी हुई है। सन्ध्या होने में अभी कुछ देर है। श्रीरामकृष्ण भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। उनसे कुशल-प्रश्न पूछ रहे हैं। केदार बड़े ही विनीत भाव से हाथ जोड़कर बहुत ही मृदु तथा मधुर शब्दों में श्रीरामकृष्ण से निवेदन कर रहे हैं। पास हैं नरेन्द्र, चुनी, सुरेन्द्र, राम, मास्टर और हरीश।

केदार – (श्रीरामकृष्ण से, विनयपूर्वक) – सिर का चक्कर खाना किस तरह अच्छा होगा?

श्रीरामकृष्ण – (सस्नेह) – ऐसा होता है; मुझे भी हुआ था। थोड़ा थोड़ा बादाम का तेल सिर में लगाकर मालिश कर लिया कीजिये। सुना है, इस तरह यह बीमारी अच्छी हो जाती है।

केदार – जो आज्ञा।

श्रीरामकृष्ण – (चुनी से) – क्यों जी, तुम सब कैसे हो?

चुनी – जी, इस समय तो सब कुशल है। वृन्दावन में बलराम बाबू और राखाल अच्छी तरह हैं।

श्रीरामकृष्ण – तुमने इतनी मिठाई क्यों भेज दी?

चुनी – जी, वृन्दावन से आ रहा हूँ।

चुनीलाल बलराम के साथ वृन्दावन गये हुए थे और कई महीने तक वहीं ठहरे थे। छुट्टी पूरी हो रही है, इसलिए अब कलकत्ता लौट आये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हरीश से) – तू दो-एक दिन बाद जाना। अभी बीमारी की हालत है, जाने पर वहाँ फिर बीमार पड़ जायगा।

(नारायण से, सस्नेह) “बैठ, आ मेरे पास आकर बैठ। कल जाना और वहीं खाना भी। (मास्टर की ओर इशारा करके) इनके साथ जाना। (मास्टर से) क्यों जी?”

मास्टर की इच्छा थी, वे उसी दिन श्रीरामकृष्ण के साथ दक्षिणेश्वर जायें, अतएव वे सोचने लगे। सुरेन्द्र बड़ी देर तक थे। बीच में एक बार घर गये थे। घर से लौटकर