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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 693

६७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

नारियल इतने ऊँचे रहता है, धूप लगती है, फिर भी उसके जल की तासीर ठण्डी है। इधर पानी-फल (सिंघाड़े) पानी में रहते हैं, परन्तु उनकी तासीर गर्म होती है।

“आदमी का शरीर देखो। सिर जो मूल है, ऊपर चला गया।”

मणिलाल – हमारा इस समय कर्तव्य क्या है?

श्रीरामकृष्ण – किसी तरह उनके साथ युक्त होकर रहना। दो रास्ते हैं, कर्मयोग और मनोयोग।

“जो लोग गृहस्थाश्रमी हैं, उनका योग कर्म के द्वारा होता है। चार आश्रम हैं – ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। संन्यासी को काम्य कर्मों का त्याग करना चाहिए, परन्तु नित्यकर्म उसे कामना-हीन होकर करना चाहिए। दण्डधारण, भिक्षा, तीर्थ-यात्रा, पूजा, जप, इन सब कर्मों के द्वारा उनके साथ योग होता है।

“और चाहे जो काम करो, फल की आकांक्षा का त्याग करके, फल की आकांक्षा को छोड़कर कर सको तो उनके साथ योग होगा।

“एक मार्ग और है, मनोयोग; इस तरह के योगी में बाहर से कोई चिह्न नहीं दीख पड़ते। उसका योग अन्तर से होता है। जैसे जड़भरत तथा शुकदेव। और भी बहुत से हैं, पर ये दो प्रसिद्ध हैं। इनकी दाढ़ी और बाल तैसे ही रहते हैं, वे उन्हें नहीं निकालते।

“परमहंस अवस्था में कर्म उठ जाते हैं। तब स्मरण-मनन ही रहता है। सदा ही मन का योग रहता है। अगर वह कर्म भी करता है तो लोक-शिक्षा के लिए।

“चाहे कर्म के द्वारा योग हो या मन के द्वारा, भक्ति के होने पर सब समझ में आ जाता है।

“भक्ति से कुम्भक आप ही हो जाता है। मन में एकाग्रता होने पर ही वायु स्थिर हो जाती है, और वायु के स्थिर होने पर ही मन एकाग्र होता है, बुद्धि स्थिर हो जाती है। जिसे होता है, वह खुद नहीं समझ सकता।

“भक्तियोग में योग के साधन होते हैं। मैंने माँ से रो-रोकर कहा था – 'माँ, योगियों ने योग करके, ज्ञानियों ने विचार करके जो कुछ समझा है, वह सब तू मुझे समझा दे – मुझे दिखला दे।' माँ ने मुझे सब कुछ दिखा दिया है। व्याकुल होकर, उनके निकट रोने पर सब कुछ बतला देती हैं। वेद, वेदान्त, पुराण, इन सब शास्त्रों में क्या है, सब उन्होंने मुझे समझा दिया है।”

मणि – हठयोग?

श्रीरामकृष्ण – हठयोगी देहाभिमानी साधु हैं। वे बस नेति-धौति करते हैं – केवल देह की चिन्ता! उनका उद्देश्य आयु की वृद्धि करना है। देह की ही दिनरात सेवा किया करते हैं। यह अच्छा नहीं।

“तुम्हारा कर्तव्य क्या है? – तुम लोग मन ही मन कामिनी और कांचन का त्याग

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