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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६७२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

“ये ही लोग आचार्य हैं! ये लोग अगर कहें, ईश्वर सत्य है और सब मिथ्या, तो इनकी बात का विश्वास भला किसे हो सकता है?

“जैसा गुरु है, उसको शिष्य भी वैसे ही मिलते हैं। संन्यासी भी अगर मन से त्याग करके बाहर कामिनी और कांचन लेकर रहे, तो उसके द्वारा लोक-शिक्षा नहीं हो सकती। लोग कहेंगे, यह छिपकर गुड़ खाता है।

“सींती का महेन्द्र वैद्य रामलाल को पाँच रुपये दे गया था। मुझे यह बात मालूम नहीं थी।

“रामलाल के कहने पर मैंने पूछा, किसे दिया है? उसने कहा, यहाँ के लिए। मैंने पहले सोचा कि दूधवाले को रुपया देना है, न हो, इन्हीं में से दे दिया जायगा! हरे-हरे! जब कुछ रात हुई, तब मैं खाट पर उठकर बैठ गया – बड़ी बेचैनी थी। जान पड़ता था, छाती में कोई खरोंच रहा है! तब रामलाल के पास जाकर मैंने फिर पूछा – 'उसने तेरी चाची को तो नहीं दिया है?' उसने कहा – 'नहीं।' तब मैंने कहा, 'तू अभी रुपये लौटा दे।' रामलाल उसके दूसरे दिन रुपये लौटा आया।

“संन्यासी के लिए रुपये लेना या लोभ में फँस जाना कैसा है, जानते हो? जैसे ब्राह्मण की विधवा बहुत दिनों तक आचार और ब्रह्मचर्य से रहकर एक दिन एक नीच शूद्र के साथ निकल गयी थी।

“उस देश में भगी तेलिन के बहुत से चेले हो गये थे। शूद्र को सब लोग प्रणाम करते हैं, यह देखकर वहाँ के जमींदार ने उसके पीछे किसी बदमाश को भिड़ा दिया। उसने उसका धर्म नष्ट कर दिया। साधन-भजन सब मिट्टी में मिल गया। पतित संन्यासी भी वैसा ही है।

“तुम लोग संसारी हो, तुम्हारे लिए सत्संग की आवश्यकता है।

“पहले है साधुसंग, फिर है श्रद्धा। साधु सन्त अगर उनका नाम न लें – उनका गुण न गायें, तो ईश्वर पर लोगों का विश्वास और श्रद्धा-भक्ति कैसे हो सकती है? जब लोग तुम्हें तीन पुश्त का अमीर समझेंगे, तभी मानेंगे न?

(मास्टर से) “ज्ञान के होने पर भी सदा अनुशीलन चाहिए। नागा (तोतापुरी) कहता था, लोटे को एक दिन मलने से क्या होगा? डाल रखोगे तो फिर मैला हो जायगा।

“तुम्हारे घर एक बार जाना है। तुम्हारा अड्डा अगर मालूम रहा तो सम्भव है, वहाँ बहुत से भक्त आ मिलें। तुम ईशान के पास एक बार जाना।

(मणिलाल से) “केशव सेन की माँ आयी थीं। उनके घर के बालकों ने हरिनाम गाया। वे तालियाँ बजा-बजाकर उनकी प्रदक्षिणा करने लगीं। मैंने देखा, शोक से उन्हें बहुत दुःख न था। यहाँ आकर वे एकादशी को माला लेकर जप करती थीं। मैंने देखा, उनमें बड़ी भक्ति है।”