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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६७४ श्रीरामकृष्णवचनामृतँ २ अक्टूबर, १८८४

मुखर्जी – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – अब मेरा जी ठिकाने हुआ।

मणि मल्लिक – आप बहते हुए पानी में नहाया कीजिये। दवा की क्या जरूरत है?

श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, तुम्हारा अभी खून ताज़ा है, तुम्हारी बात ही कुछ और है?

“मुझे बच्चे की अवस्था में रखा है।

“एक दिन घास के जंगल में मुझे किसी कीड़े ने काट लिया। मैंने सुना था, साँप अगर दो बार काटे तो विष निकाल लेता है। इसी ख्याल से बिलों में हाथ डालता फिरता था। एक ने आकर कहा, 'यह आप क्या कर रहे हैं? – साँप जब उसी जगह फिर काटता है, तब विष निकाल लेता है। दूसरी जगह काटने से नहीं होता।'

“मैंने सुना था, शरद् काल की ओस लगाना अच्छा है। उस दिन कलकत्ते से आते हुए गाड़ी में से सिर निकालकर मैंने खूब ओस लगायी। (सब हँसते हैं।)

(सींती के महेन्द्र से) “तुम्हारे सींती के वे पण्डितजी अच्छे हैं। वेदान्तवागीश हैं, मुझे मानते हैं। जब मैंने कहा, तुमने तो खूब अध्ययन किया है – परन्तु 'मैं अमुक पण्डित हूँ', ऐसे अभिमान का त्याग करना, तब उसे बड़ा आनन्द हुआ।

“उसके साथ वेदान्त की बातें हुईं।

(मास्टर से) “जो शुद्ध आत्मा हैं, वे निर्लिप्त हैं। उनमें माया या अविद्या है। इस माया के भीतर तीन गुण हैं – सत्त्व, रज और तम। जो शुद्ध आत्मा हैं उन्हीं में ये तीनों गुण हैं; किन्तु फिर भी वे निर्लिप्त हैं। आग में अगर आसमानी रंग की बड़ी डाल दो तो उसकी शिखा उसी रंग की दीख पड़ती है। लाल बड़ी छोड़ो तो शिखा भी लाल हो जाती है। परन्तु आग का अपना कोई रंग नहीं है।

“पानी में आसमानी रंग डालो तो आसमानी रंग हो जायेगा और फिटकरी छोड़ो तो वही पानी का रंग रहता है।

“चाण्डाल मांस का भार लिये जा रहा था। उसने आचार्य शंकर को छू लिया। शंकर ने ज्योंही कहा – 'तूने मुझे छू लिया?' चाण्डाल बोला – 'महाराज, न तुम्हें मैंने छुआ और न मुझे तुमने। तुम तो शुद्ध आत्मा हो – निर्लिप्त हो।'

“जड़भरत ने भी ऐसी ही बातें राजा रहूगण से कही थीं।

“शुद्ध आत्मा निर्लिप्त है और शुद्ध आत्मा को कोई देख नहीं सकता। पानी में नमक घोला हुआ हो तो आँखें नमक को देख नहीं सकतीं।

“जो शुद्ध आत्मा हैं, वही महाकारण – कारण का कारण हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण और महाकारण, ये इतने हैं। पाँच भूत स्थूल हैं। मन, बुद्धि और अहंकार सूक्ष्म हैं। प्रकृति अथवा आद्याशक्ति सब की कारणरूपिणी है। ब्रह्म या शुद्ध आत्मा कारण का कारण है।

“यही शुद्ध आत्मा हमारा स्वरूप है।