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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२ अक्टूबर, १८८४ | परिच्छेद ९५ | ६७७

ग्राह्य है! तो आपको अभी ज्ञान नहीं हुआ।'

“मैंने कहा, नहीं भाई, इतना ज्ञान मुझे नहीं हुआ। (सब हँसते हैं।)

“लक्ष्मीनारायण ने तब वह धन हृदय के हाथ में देना चाहा। मैंने कहा – 'तो मुझे कहना होगा, इसे दे, उसे दे'; अगर उसने न दिया तो क्रोध का आना अनिवार्य होगा। रुपयों का पास रहना ही बुरा है। ये सब बातें न होंगी।

“आईने के पास अगर कोई वस्तु रखी हुई हो, तो क्या उसका प्रतिबिम्ब न पड़ेगा?”

मारवाड़ी भक्त – महाराज, क्या गंगा में शरीर-त्याग होने पर मुक्ति होती है?

श्रीरामकृष्ण – ज्ञान होने ही से मुक्ति होती है। चाहे जहाँ रहो – चाहे महा कलुषित स्थान में प्राण निकलें, और चाहे गंगातट ही हो; ज्ञानी की मुक्ति अवश्य होगी।

“परन्तु हाँ, अज्ञानी के लिए गंगातट ठीक है।”

मारवाड़ी भक्त – महाराज, काशी में मुक्ति कैसे होती हैं?

श्रीरामकृष्ण – काशी में मृत्यु होने पर शिव के दर्शन होते हैं। शिव प्रकट होकर कहते हैं – 'मेरा यह साकार रूप मायिक है, मैं भक्तों के लिए वह रूप धारण करता हूँ – यह देख, मैं अखण्ड सच्चिदानन्द में लीन होता हूँ।' यह कहकर वह रूप अन्तर्धान हो जाता है।

“पुराण के मत से चाण्डाल को भी अगर भक्ति हो, तो उसकी भी मुक्ति होगी। इस मत के अनुसार नाम लेने से ही काम होता है। योग, तन्त्र, मन्त्र, इनकी कोई आवश्यकता नहीं है।

“वेद का मत अलग है। ब्राह्मण हुए बिना मुक्ति नहीं होती। और मन्त्रों का यथार्थ उच्चारण अगर नहीं होता तो पूजा का ग्रहण ही नहीं होता। याग, यज्ञ, मन्त्र, तन्त्र, इन सब का अनुष्ठान यथाविधि करना चाहिए।

“कलिकाल में वेदोक्त कर्मों के करने का समय कहाँ है? इसीलिए कलि में नारदीय भक्ति चाहिए।

“कर्मयोग बड़ा कठिन है। निष्काम कर्म अगर न कर सके तो वह बन्धन का ही कारण होता है। इस पर आजकल प्राण अन्नगत हो रहे हैं। अतएव विधिवत् सब कर्मों के करने का समय नहीं रहा। दशमूल-पाचन अगर रोगी को खिलाया जाता है तो इधर उसके प्राण ही नहीं रहते, अतएव चाहिए फीवर-मिक्सचर।

“नारदीय भक्ति है – उनके नाम और गुणों का कीर्तन करना।

“कलिकाल के लिए कर्मयोग ठीक नहीं, भक्तियोग ही ठीक है।

“संसार में कर्मों का भोग जितने दिनों के लिए है, उतने दिन तक भोग करो, परन्तु भक्ति और अनुराग चाहिए। उनके नाम और गुणों का कीर्तन करने पर कर्मों का क्षय हो