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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 703

६८० श्रीरामकृष्णवचनामृत २ अक्टूबर, १८८४

“सन्ध्या गायत्री में लीन हो जाती है और गायत्री ओंकार में।

“एक बार ॐ कहने के साथ ही जब समाधि हो जाय तब समझना चाहिए कि अब साधु साधन-भजन में पक्का हो गया।

“हृषीकेश में एक साधु सुबह उठकर, जहाँ एक बहुत बड़ा झरना है, वहाँ जाकर खड़ा होता है। दिन भर वही झरना देखता है और ईश्वर से कहता है, ‘वाह, खूब बनाया है तुमने! कितने आश्चर्य की बात है!’ उसके लिए जप-तप कुछ नहीं है। रात होने पर वह अपनी कुटी पर लौट जाता है।

“निराकार या साकार इन सब बातों के सोचने की ऐसी क्या आवश्यकता है! निर्जन में व्याकुल हो रो-रोकर उनसे कहने से ही काम बन जायगा। कहो – ‘हे ईश्वर, तुम कैसे हो, यह मुझे समझा दो, मुझे दर्शन दो।’

“वे अन्दर भी हैं और बाहर भी।

“अन्दर भी वे ही हैं। इसीलिए वेद कहते हैं – तत्त्वमसी। और बाहर भी वे ही हैं। माया से अनेक रूप दिखायी पड़ते हैं। परन्तु वस्तुतः हैं वे ही।

“इसीलिए सब नामों और रूपों का वर्णन करने के पहले कहा जाता है – ॐ तत् सत्।

“दर्शन करने पर एक तरह का ज्ञान होता है और शास्त्रों से एक दूसरी तरह का। शास्त्रों में उसका आभास मात्र मिलता है, इसलिए कई शास्त्रों के पढ़ने की कोई जरूरत नहीं। इससे निर्जन में उन्हें पुकारना अच्छा है।

“गीता सब न पढ़ने से भी काम चलता है। दस बार गीता गीता कहने से जो कुछ होता है, वही गीता का सार है। अर्थात् त्यागी। हे जीव, सब त्याग करके ईश्वर की आराधना करो। यही गीता का सार है।”

श्रीरामकृष्ण को भक्तों के साथ काली की आरती देखते देखते भावावेश हो रहा है। अब देवी-प्रतिमा के सामने भूमिष्ठ होकर प्रणाम नहीं कर सकते। भावावेश अब भी है। भावावस्था में वार्तालाप कर रहे हैं।

मुखर्जी के आत्मीय हरि की उम्र अठारह-बीस साल की होगी। उनका विवाह हो गया है। इस समय मुखर्जी के ही घर पर रहते हैं। कोई काम करनेवाले हैं। श्रीरामकृष्ण पर बड़ी भक्ति है।

श्रीरामकृष्ण – (भावावेश में हरि से) – तुम अपनी माँ से पूछकर मन्त्र लेना। (श्रीयुत प्रिय से) मैं इनसे (हरि से) कह भी न सका, मन्त्र तो मैं देता ही नहीं हूँ।

“तुम जैसा ध्यान-जप करते हो; वैसा ही करते रहो।”

प्रिय – जो आज्ञा।

श्रीरामकृष्ण – और मैं इस अवस्था में कह रहा हूँ; बात पर विश्वास करना। देखो,