श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १६ अक्टूबर, १८८२
हँसते हुए कहते हैं, “भला तुम्हारी क्या बातचीत हो रही है?” नरेन्द्र ने कहा, “इनसे स्कूल की चर्चा हो रही थी। लड़कों का चरित्र ठीक नहीं रहता।” श्रीरामकृष्ण थोड़ी देर तक उन बातों को सुनकर मास्टर से गम्भीर भाव से कहते हैं, “ऐसी बातचीत अच्छी नहीं। ईश्वर की बातों को छोड़ दूसरी बातें अच्छी नहीं। तुम इनसे उम्र में बड़े हो, तुम सयाने हुए हो, तुम्हें ये सब बातें उठने देना उचित न था।”
उस समय नरेन्द्र की उम्र उन्नीस-बीस रही होगी और मास्टर की सत्ताईस-अट्ठाईस।
मास्टर लज्जित हुए, नरेन्द्र आदि भक्त चुप रहे।
श्रीरामकृष्ण खड़े होकर हँसते हुए नरेन्द्र आदि भक्तों को भोजन कराते हैं। आज उनको बड़ा आनन्द हुआ है।
भोजन के बाद नरेन्द्र आदि भक्त श्रीरामकृष्ण के कमरे में फर्श पर बैठे विश्राम कर रहे हैं और श्रीरामकृष्ण से बातें कर रहे हैं। आनन्द का मेला-सा लग गया है। बातों बातों में श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र से कहते हैं – ‘चिदाकाश में पूर्ण प्रेमचन्द्र का उदय हुआ’ जरा इस गाने को तो गा।
नरेन्द्र ने गाना शुरू किया। साथ ही अन्य भक्त मृदंग और करताल बजाने लगे। गीत का आशय इस प्रकार था –
“चिदाकाश में पूर्ण प्रेमचन्द्र का उदय हुआ। क्या ही आनन्दपूर्ण प्रेमसिन्धु उमड़ आया! जय दयामय, जय दयामय, जय दयामय! चारों ओर भक्तरूपी ग्रह जगमगाते हैं। भक्तसखा भगवान भक्तों के संग लीलारसमय हो रहे हैं। जय दयामय! स्वर्ग का द्वार खोल, आनन्द का तूफान उठाते हुए नवविधान* रूपी वसन्त-समीर चल रहा है। उससे लीलारस और प्रेमगन्धवाले कितने ही फूल खिल जाते हैं जिनकी महक से योगीवृन्द योगानन्द में मतवाले हो जाते हैं। जय दयामय! संसार-ह्रद के जल पर नवविधान-रूपी कमल में आनन्दमयी माँ विराजती हैं, और भावावेश से आकुल भक्तरूपी भौंरे उसमे सुधापान कर रहे हैं। वह देखो माता का प्रसन्न वदन – जिसे देखकर चित्त खिल उठता है और जगत् मुग्ध हो जाता है। और देखो – माँ के श्रीचरणों के पास साधुओं का समूह, वे मस्त होकर नाच-गा रहे हैं। अहा, कैसा अनुपम रूप है – जिसे देखकर प्राण शीतल हो गए। ‘प्रेमदास’ सब के चरण पकड़कर कहता है कि भाई, सब मिलकर माँ की जय गाओ।”
कीर्तन करते करते श्रीरामकृष्ण नृत्य कर रहे हैं। भक्त भी उन्हें घेरकर नाच रहे हैं।
कीर्तन समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में टहल रहे हैं। श्रीयुत हाजरा उसी के उत्तर भाग में बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण जाकर वहाँ बैठे। मास्टर भी वहीं बैठे हैं
* श्री केशव सेन द्वारा स्थापित ब्राह्मसमाज का नाम