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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१६ अक्टूबर, १८८२परिच्छेद १०७१

गहरी चिन्ता में डूबे हुए मणि दीवार से टेककर एक तरफ खड़े रहे। नरेन्द्र आदि भक्त भी थोड़ी देर निर्वाक् हो रहे।

श्रीरामकृष्ण उनसे जरा बातचीत कर रहे हैं। एकाएक मणि के पास आकर एकान्त में मृदु स्वर से कहते हैं, “परन्तु जिसकी ईश्वर पर सच्ची भक्ति है, उसके वश में सभी आ जाते हैं – राजा, बुरे आदमी, स्त्री – सब। यदि किसी की भक्ति सच्ची हो तो स्त्री भी क्रम से ईश्वर की राह पर जा सकती है। आप अच्छे हुए तो ईश्वर की इच्छा से वह भी अच्छी हो सकती है।”

मणि की चिन्ताग्नि पर पानी बरसा। वे अब तक सोच रहे थे – स्त्री आत्महत्या कर ले तो करने दो, मैं क्या कर सकता हूँ?

मणि (श्रीरामकृष्ण से) – संसार में बड़ा डर रहता है।

श्रीरामकृष्ण – (मणि और नरेन्द्र से) – इसी से तो चैतन्यदेव ने कहा था, ‘सुनो भाई नित्यानन्द, संसारी जीवों के लिए कोई उपाय नहीं।’

(मणि से, एकान्त में) – “यदि ईश्वर पर शुद्धा भक्ति न हुई तो कोई उपाय नहीं। यदि कोई ईश्वर का लाभ करके संसार में रहे तो उसे कुछ डर नहीं। यदि बीच बीच में एकान्त में साधना करके कोई शुद्धा भक्ति प्राप्त कर सके तो संसार में रहते हुए भी उसे कोई डर नहीं। चैतन्यदेव के संसारी भक्त भी थे। वे तो कहने भर के लिए संसारी थे। वे अनासक्त होकर रहते थे।”

देव-देवियों की भोग-आरती हो चुकी, वैसे ही नौबत बजने लगी। अब उनके विश्राम का समय हुआ। श्रीरामकृष्ण भोजन करने बैठे। नरेन्द्र आदि भक्त आज भी आपके पास प्रसाद पाएँगे।

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