भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 30

उसमेंभी स्थान-स्थानपर अन्यान्य ग्रंथोंका जो उल्लेख हैं, उनको मूल ग्रंथोंसे ठीक ठीक जाँचने, एवं यदि कहीं कोई व्यंग रह गया हो, तो उसे दिखलानेका काम श्रीयुत हरि रघुनाथ भागवतने अकेलेही किया है। तात्पर्य यह है, कि बिना इन लोगोंकी सहायताके इस ग्रंथको हम इतनी शीघ्रतासे प्रकाशित न कर पाते। अतएव हम इन सबको हृदयसे धन्यवाद देते हैं। अब रही छपाई, चित्रशाला छापाखानेके स्वत्वाधिकारीने इस ग्रंथको सावधानीपूर्वक और शीघ्रतासे छाप देना स्वीकारकर तदनुसार इस कामको पूर्ण कर दिया; इस निमित्त अंतमें उनकाभी उपकार मानना आवश्यक है। खेतमें फसल हो जानेपरभी फसलसे अन्न तैयार करके भोजन करने- वालोंके मुंहमें पहुँचनेतक, जिस प्रकार अनेक लोगोंकी सहायता अपेक्षित रहती है, वैसीही कुछ अंशोंमें ग्रंथकारकी - कमसे कम हमारी तो स्थिति है। अतएव उक्त रीतिसे जिन लोगोंने हमारी सहायता की है, - फिर चाहे उनके नाम यहाँ आये हों अथवा नभी आये हों, - उन सबको फिर एक बार धन्यवाद देकर हम इस प्रस्तावनाको समाप्त करते हैं। प्रस्तावना समाप्त हो गई। अब जिस विषयके विचारमें आजतक बहुतेरे वर्ष बीत गये हैं और जिसके नित्य सहवास एवं चिंतनसे मनको समाधान होकर आनंद होता गया, वह विषय आज ग्रंथके रूपमें हमसे पृथक् होनेवाला है, इसलिये यद्यपि दुख होता है, तथापि ये विचार - सध गये तो व्याजसहित, अन्यथा कमसे कम ज्यों-के-त्यों - अगली पीढ़ीके लोगोंको देनेके लियेही हमें प्राप्त हुए थे; अतएव वैदिक धर्मके राजगुह्यके इस पारसको कठोपनिषद्के "उत्तिष्ठत! जाग्रत! प्राप्य वरान्निबोधत!" (कठ. ३. १४) - उठो! जागो! और (भगवानके दिये हुए) इस वरदानको समझ लो! इस मंत्रसे हम होनहार पाठकोंको प्रेमोदपूर्वक सौंपते हैं। इसीमें कर्म-अकर्मका सारा बीज है; और स्वयं भगवानकाही निश्चय- पूर्वक यह आश्वासन है, कि सृष्टिके इस नियमपर ध्यान देकर कि इस धर्मका स्वल्प आचरणभी बड़े-बड़े संकटोंसे बचाता है। इससे अधिक और क्या चाहिये! बिना किये कुछभी होता नहीं है; तुमको बस केवल "निष्काम बुद्धिसे कर्म करते रहना चाहिये" निरी स्वार्थपरायण-बुद्धिसे गृहस्ती चलाते चलाने जो लोग हारकर थक गये हों, उनका समय बितानेके लिये, अथवा संसारको छोड़ देनेकी तैयारीके लियेभी, गीता नहीं कही गई है, गीताशास्त्रकी प्रवृत्ति प्रत्युत इसलिये हुई है, कि वह और तात्त्विक दृष्टिसे इस बातका उपदेश करे, कि मोक्ष-दृष्टिसे संसारके कर्मही किस प्रकार किये जावें, संसारमें मनुष्यमात्रका सच्चा कर्तव्य क्या है, अतः अंतमें हमारी यही बिनती है, कि प्रत्येक मनुष्य पूर्व अवस्थामेंही - चढ़ती हुई उम्रमें ही - गृहस्थाश्रमके, अथवा, संसारके, इस प्राचीन शास्त्रको, जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी समझे बिना न रहे। पूना, अधिक वैशाख बाळ गंगाधर टिळक संवत् १९७२ वि.