भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 341

२९६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र गया है, कि ज्ञान और वैराग्यसे कर्मक्षय हुए बिना मोक्ष नहीं मिल सकता, इसलिये इन दोनों सिद्धान्तोंका मेल करके हमारा अंतिम कथन यह है, कि सब कर्मोंको ज्ञानसे अर्थात् फलाशा छोड़कर निष्काम या विरक्त-बुद्धिसे करते रहना चाहिये । (गीता ३. १७, १९) । यदि तुम स्वर्गफलकी काम्य-बुद्धि मनमें रखकर ज्योतिष्टोम आदि यज्ञयाग करोगे, तो वेदोंमें कहे अनुसार स्वर्ग-फल तुम्हें निस्संदेह मिलेगा; क्योंकि वेदाज्ञा कभीभी झूठ नहीं हो सकती । परंतु स्वर्ग-फल नित्य अर्थात् हमेशा टिकने- वाला नहीं है । इसलिये उपनिषदोंमें कहा गया है (बृ. ४. ४. ६ ; वे. सू. ३. १. ८ ; मभा. वन. २६०. ३९ ) :- प्राप्यान्तं कर्मणस्तस्य यत्किञ्चेह करोत्ययम् । तस्माल्लोकात्पुनरेत्यस्मै लोकाय कर्मणे ॥ * “ इस लोकमें यज्ञ-याग आदि जो पुण्य-कर्म किये जाते हैं, उनका फल स्वर्गीय उप- भोगसे समाप्त हो जाता है; और तब यज्ञ करनेवाले कर्मकांडी मनुष्यको स्वर्गलोकसे इस कर्मलोक अर्थात् भूलोकमें फिरभी आना पड़ता है।” छांदोग्योपनिषद्में ( छां. ५. १०. ३-९ ) तो स्वर्गसे नीचे आनेका मार्गभी बतलाया गया है । भगवद्- गीतामें “ कामात्मानः स्वर्गपराः ” या “ त्रैगुण्यविषया वेदाः ” (गीता २. ४३, ४५) इस प्रकार जो कुछ गौणत्वसूचक वर्णन किया गया है, वह इन्हीं कर्मकांडी लोगोंको लक्ष्य करके कहा गया है और नौवें अध्यायमें फिरसे स्पष्टतया कहा गया है, कि “ गतागतं कामकामा लभन्ते ।” ( गीता ९. २१ ) – उन्हें स्वर्गलोक और इस लोकमें बार बार आना-जाना पड़ता है। यह आवागमन ज्ञानप्राप्तिके बिना रुक नहीं सकता और जब तक यह रुक नहीं सकता, तब तक आत्माको सच्चा समाधान, पूर्णावस्था या मोक्षभी नहीं मिल सकता । इसलिये गीताके समस्त उपदेशका सार यही है, कि यज्ञ-याग आदिकी कौन कहे ? – चातुर्वर्ण्यके सब कर्मोंकोभी तुम ब्रह्मात्मैक्यपर – ज्ञानसे तथा साम्यबुद्धिसे आसक्ति छोड़कर करते रहो, तो बस इस प्रकार कर्मचक्रको जारी रखकरभी तुम मुक्तही बने रहोगे ( गीता १८. ५, ६) । किसी देवताके नामसे तिल, चावल या किसी पशुको ‘ इदं अमुकदेवतायै न मम ’ कहकर अग्निमें हवन कर देनेसेही कुछ यज्ञ नहीं हो जाता । प्रत्यक्ष पशुको मारनेकी अपेक्षा प्रत्येक मनुष्यके शरीरमें काम-क्रोध आदि जो अनेक पशुवृत्तियाँ हैं, उनका साम्यबुद्धिरूप संयमाग्निमें होम करनाही अधिक श्रेयस्कर यज्ञ है ( गीता ४. ३३ ) । इसी अभिप्रायसे गीतामें तथा नारायणीय धर्ममें भगवान्ने कहा है, कि “ मैं यज्ञोंमें जपयज्ञ ” अर्थात् श्रेष्ठ हूँ ( गीता १०. २५, मभा. शां. ३. ३७) ।

  • इस मंत्रके दूसरे चरणको पढ़ते समय ‘पुनरेति’ और ‘अस्मै’ ऐसा पदच्छेद करके पढ़ना चाहिये । तब इस चरणमें अक्षरोंकी कमी नहीं मालूम होगी । वैदिक ग्रंथोंको पढ़ते समय ऐसा बहुधा करना पड़ता है ।