श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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नहीं है, वह उसी अग्निसे धुआँ, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायनके छः महीने इस क्रमसे प्रयाण करता हुआ चंद्रलोकको पहुँचता है; और अपने किये हुए सब पुण्यकर्मोंको भोग करके फिर इस लोकमें जन्म लेता है - इन दोनों मार्गोंमें यही भेद है (गीता ८. २३-२७) । 'ज्योति' (ज्वाला) शब्दके बदले उपनिषदोंमें 'अर्चिः' (ज्वाला) शब्दका प्रयोग किया गया है, जिससे पहले मार्गको 'अर्चिरादि' और दूसरेको, 'धूमादि' मार्गभी कहते हैं। हमारा उत्तरायण उत्तर ध्रुवस्थलमें रहनेवाले देवताओंका दिन है, और हमारा दक्षिणायन उनकी रात्रि है। इस परि- भाषापर ध्यान देनेसे मालूम हो जाता है, कि इन दो मार्गोंमेंसे पहला - अर्चिरादि (ज्योतिरादि) - मार्ग आरंभसे अंततक प्रकाशमय है; और दूसरा - धूमादि
- मार्ग अंधकारमय है। ज्ञान प्रकाशमय है; और परब्रह्म "ज्योतिषां ज्योतिः" (गीता १३. १७) - तेजोंका तेज है, इसलिये देहपात होनेके अनंतर, ज्ञानी पुरुषोंके मार्गका प्रकाशमय होना उचितही है, और गीतामें इन दो मार्गोंको 'शुक्ल' और 'कृष्ण' इसीलिये कहा है, कि उनकाभी अर्थ प्रकाशमय और अंधकारमय है। गीतामें उत्तरायणके बादके सोपानोंका वर्णन नहीं है। परंतु यास्कके निरुक्तमें उदगयनके बाद देवलोक, सूर्य, वैद्युत और मानस पुरुषका वर्णन है (निरुक्त. १४. ९)। और उपनिषदोंमें देवयानके विषयमें जो वर्णन है, उनकी एकवाक्यता करके वेदान्तसूत्रमें यह क्रम दिया है, कि उत्तरायणके बाद संवत्सर, वायुलोक, सूर्य, चंद्र, विद्युत्, वरुणलोक, इंद्रलोक, प्रजापतिलोक और अंतमें ब्रह्मलोक है (बृ. ५. १०; ६. २. १५; छां. ५. १०; कौषी. १. ३; वे. सू. ४. ३. १-६)। देवयान और पितृयाण मार्गोंके सोपानों या मुकामोंका वर्णन हो चुका। परंतु इनमें जो दिवस, शुक्लपक्ष, उत्तरायण इत्यादिके वर्णन हैं, उनका सामान्य अर्थ कालवाचक होता है। इसलिये सहजही यह प्रश्न उपस्थित होता है, कि क्या देवयान और पितृयाण मार्गोंका कालसे कुछ संबंध है? अथवा पहले कभी था, या नहीं? यद्यपि दिवस, रात्रि, शुक्लपक्ष इत्यादि शब्दोंका अर्थ कालवाचक है; तथापि अग्नि, ज्वाला, वायुलोक, विद्युत् आदि जो अन्य सोपान हैं, उनका अर्थ कालवाचक नहीं हो सकता। और यदि माना जाय, कि ज्ञानी पुरुषको, दिन अथवा रातके समय मरनेपर, भिन्न भिन्न गति मिलती है, तब तो ज्ञानका कुछ महत्त्वही नहीं रह जाता। इसलिये अग्नि, दिवस, उत्तरायण इत्यादि सभी शब्दोंको कालवाचक न मानकर वेदान्तसूत्रमें यह सिद्धान्त किया गया है, कि ये शब्द इनके अभिमानी देवताओंके लिये कल्पित किये गये हैं, जो ज्ञानी और कर्मकांडी पुरुषोंके आत्माको भिन्न भिन्न मार्गोंसे ब्रह्मलोक और चंद्रलोकमें ले जाते हैं (वे. सू. ४. २. १९-२१; ४. ३. ४)। परंतु इसमें संदेह है, कि भगवद्गीताको यह मत मान्य है या नहीं। क्योंकि उत्तरायणके बादके उन सोपानोंका - कि जो कालवाचक नहीं हैं - गीतामें वर्णन नहीं है। इतनाही नहीं; बल्कि इन मार्गोंको बतलानेके पहले भगवान्ने कालका