श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अठारहवें अध्यायमें यह सिद्धान्त किया है, कि “निस्संग-बुद्धिसे, फलाशा छोड़कर, केवल कर्तव्य समझकर, कर्म करनाही सच्चा 'सात्त्विक' कर्मत्याग है”-कर्म छोड़ना सच्चा कर्मत्याग नहीं है (गीता १८. ९)। कर्म मायासृष्टिकेही क्यों न हों, परंतु किसी अगम्य उद्देश्यसे परमेश्वरनेही तो उन्हें बनाया है और उनको बंद करना मनुष्यके अधिकारकी बात नहीं, वह परमेश्वरके अधीन है। अतएव यह बात निर्विवाद है, कि बुद्धिको निःसंग रखकर केवल शरीर-कर्म करनेसे, वे मोक्षके बाधक नहीं होते। तब चित्तको विरक्त कर केवल इंद्रियोंसे शास्त्रसिद्ध कर्म करनेमें हानिही क्या है? गीतामें कहाही है, कि-“नहि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्” (गीता ३. ५; १८. ११)।-इस जगत्में कोई एक क्षणभरभी बिना कर्मके रह नहीं सकता। और अनुगीतामें कहा है कि, “नैष्कर्म्यं नच लोकेऽस्मिन् मुहूर्तमपि लभ्यते” (अश्व. २०. ७) - इस लोकमें (किसीसेभी) घड़ीभरके लियेभी कर्म नहीं छूटते। मनुष्योंकी तो बिसातही क्या ! सूर्य-चंद्र प्रभृतिभी निरंतर कर्मही करते रहते हैं ! अधिक क्या कहें? यह निश्चित सिद्धान्त है, कि कर्मही सृष्टि और सृष्टिही कर्म है। इसीलिये हम प्रत्यक्ष देखते हैं, कि सृष्टिकी घटनाओंको (अथवा कर्मको) क्षणभरके लियेभी विश्राम नहीं मिलता। देखिये; एक ओर भगवान् गीतामें कहते हैं- “कर्म छोड़नेसे खानेकोभी न मिलेगा” (गीता. ३. ८); तो दूसरी ओर वनपर्वमें द्रौपदी युधिष्ठिरसे कहती है, कि “अकर्मणां वै भूतानां वृत्तिः स्यान्नहि काचन” (वन. ३२. ८) अर्थात् कर्मके बिना प्राणिमात्रका निर्वाह नहीं; और इसी प्रकार दासबोधमेंभी पहले ब्रह्मज्ञान बतलाकर श्रीसमर्थ रामदास- स्वामीभी कहते हैं, “यदि प्रपंच छोड़कर परमार्थ करोगे, तो खानेके लिये अन्नभी न मिलेगा” (दास. १२. १. ३)। अच्छा; भगवानकाही चरित्र देखो तो मालूम होगा, कि आप प्रत्येक युगमें भिन्न भिन्न अवतार लेकर इस मायिक जगतमें साधुओंकी रक्षा और दुष्टोंका विनाशरूप कर्म करते आ रहे हैं (गीता ४. ८ मभा. शां. ३३९. १०३)। और उन्होंनेही गीतामें कहा है, कि यदि मैं येही कर्म न करूँ, तो संसार उजड़कर नष्ट हो जावेगा (गीता. ३. २४)। इससे सिद्ध होता है, कि जब स्वयं भगवान् जगतके धारणार्थ कर्म करते हैं, तब इस कथनसे क्या प्रयोजन है, कि ज्ञानो- त्तर कर्म निरर्थक हैं? अतएव यः क्रियावान् स पंडितः” (मभा. वन. ३१२. १०८)
- जो क्रियावान् है, वही पंडित है-इस न्यायके अनुसार अर्जुनको निमित्त कर भगवान् सबको उपदेश करते हैं, कि इस जगतमें कर्म किसीसे छूट नहीं सकते, अतः कर्मोंकी बाधासे बचनेके लिये मनुष्य अपने धर्मानुसार प्राप्त कर्तव्यको फलाशा त्यागकर अर्थात् निष्काम बुद्धिसे सदा करता रहे-यही एक मार्ग (योग) मनुष्यके अधिकारमें है; और यही उत्तमभी है। प्रकृति तो अपने व्यवहार सदैवही करती रहेगी; परंतु उसमेंसे कर्तृत्वके अभिमानकी बुद्धि छोड़ देनेसे मनुष्य मुक्तही है (गीता. ३. २७; १३. २९; १४. १९; १८. १६) । मुक्तिके लिये कर्म छोड़नेकी