श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६८६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः । ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥ १९ ॥ त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः । कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः ॥ २० ॥ निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः । शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ २१ ॥ (१९) ज्ञानी पुरुष उसीको पंडित कहते हैं, कि जिसके सभी समारंभ अर्थात् उद्योग फलकी इच्छासे विरहित होते हैं, और जिसके कर्म ज्ञानाग्निसे भस्म हो जाते हैं । । [ "ज्ञानसे कर्म भस्म होते हैं" इसका अर्थ कर्मोंको छोड़ना नहीं हैं, किंतु । इस श्लोकसे प्रकट होता है, कि "फलकी इच्छा छोड़ कर कर्म करना", यही । अर्थ यहाँ लेना चाहिये (गीतार. प्र. १०, पृ. २८६-२९१) । इसी प्रकार । आगे भगवद्भक्तके वर्णनमें जो 'सर्वारम्भपरित्यागी' समस्त - आरंभ या उद्योग । छोड़नेवाला - पद आया है (गीता १२. १६; १४. २५), उसकेभी अर्थका । निर्णय उससे हो जाता है। अब इसी अर्थको अधिक स्पष्ट करते हैं :- ] (२०) कर्मफलकी आसक्ति छोड़कर जो सदा तृप्त और निराश्रय है, अर्थात् (जो पुरुष) कर्मफलके साधनकी आश्रयभूत ऐसी बुद्धि नहीं रखता, कि अमुक कार्यकी सिद्धिके लिये अमुक काम करता है, '(कहना चाहिये, कि) वह कर्म करनेमें निमग्न रहनेपरभी कुछभी नहीं करता । (२१) 'आशीः' अर्थात् फलकी वासना छोड़नेवाला, चित्तका नियमन करनेवाला और सर्वसंगसे मुक्त पुरुष केवल शारीर अर्थात् शरीर या कर्मेंद्रियोंसेही कर्म करते समय पापका भागी नहीं होता । । [कुछ लोग बीसवें श्लोकके 'निराश्रय' शब्दका अर्थ 'घर-गिरस्ती' न । रखनेवाला (संन्यासी) करते हैं; पर वह ठीक नहीं है । आश्रयको घर या गिरस्ती । कह सकेंगे; परंतु इस स्थानपर कर्ताके स्वयं रहनेका ठिकाना विवक्षित नहीं । है; यहाँ यह अर्थ है, कि वह जो कर्म करता है, उसका हेतुरूप ठिकाना (आश्रय) । कहीं न रहे । यही अर्थ गीताके ६. १ श्लोकमें 'अनाश्रितःकर्मफलं' इन शब्दोंसे । स्पष्ट व्यक्त किया है, और वामन पंडितने गीताकी 'यथार्थदीपिका' नामक । अपनी मराठी टीकामें इसे स्वीकार किया है। ऐसेही २१ वें श्लोकमें 'शारीरके' । माने सिर्फशरीरपोषणके लिये भिक्षाटन आदि कर्म नहीं हैं । आगे पाँचवें । अध्यायमें "योगी अर्थात् कर्मयोगी लोग आसक्ति अथवा काम्य-बुद्धिको मनमें । न रखकर केवल इंद्रियोंसे कर्म किया करते हैं" (गीता ५. ११) ऐसा जो । वर्णन है, उसके समानार्थकही 'केवलं शारीरं कर्म' इन पदोंका सच्चा अर्थ है।