श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८ ॥ संजय उवाच । § § एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९ ॥ अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १० ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११ ॥ दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२ ॥ तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३ ॥ ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृतांजलिरभाषत ॥ १४ ॥ एकत्रित देख ले, और दूसराभी जो कुछ तुझ देखनेकी लालसा हो, उसेभी उसमें देख ले ! (८) परंतु तू अपनी इसी दृष्टिसे मुझे देख न सकेगा, तुझे मैं दिव्य दृष्टि देता हूं; (उससे) मेरे इस ईश्वरी योग अर्थात् योगसामर्थ्यको देख । संजयने कहा :-(९) हे राजा धृतराष्ट्र ! इस प्रकार कह करके फिर योगोंके बड़े ईश्वर हरिने अर्जुनको (अपना) श्रेष्ठ ईश्वरी रूप अर्थात् विश्वरूप दिखलाया । (१०) उसके अर्थात् उस विश्वरूपके अनेक मुख और नेत्र थे और उसमें अनेक अद्भुत दृश्य दीख पड़ते थे; (और) उसपर अनेक प्रकारके दिव्य अलंकार थे और उसमें नाना प्रकारके दिव्य आयुध सज्जत थे । (११) उस अनंत, सर्वतोमुख और सब आश्चर्योंसे भरे हुए देवताके दिव्य सुगंधित उबटन लगा हुआ था, और वह दिव्य पुष्प एवं वस्त्र धारण किये हुए था । (१२) यदि आकाशमें एक हजार सूर्योंकी प्रभा एकसाथ हो, तो वह उस महात्माकी क्रांतिके समान (कुछ कुछ) दीख पड़े ! (१३) तब अर्जुनको देवधिदेवके इस शरीरमें नाना प्रकारसे बँटा हुआ सारा जगत् एकत्रित दिखाई दिया । (१४) फिर आश्चर्यसे चकित होकर उसके शरीरपर रोमांच खड़े हो