श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभारतीय आध्यात्मिकताका सुमधुर फल " प्रत्यक्ष अनुभवसे यह स्पष्ट दिखाई देता है, कि श्रीमद्भगवद्गीता वर्तमान युगमेंभी उतनीही नव्यतापूर्ण एवं स्फूर्तिदात्री है, जितनीकी महाभारतमें समाविष्ट होते समय थी। गीताके संदेशका प्रभाव केवल दार्शनिक अथवा विद्वच्चर्चाका विषय नहीं है, अपितु आचार- विचारोंके क्षेत्रमेंभी वह सदैव जीता-जागता प्रतीत होता है। एक राष्ट्र तथा संस्कृतिका पुनरुज्जीवन, गीताका उपदेश, करता रहा है। संसारके अत्युच्च शास्त्रविषयक ग्रंथोंमें गीताका अविरोधसे समावेश हुआ है। गीता-ग्रंथ- पर स्वर्गीय लोकमान्य तिलकजीकी यह व्याख्या निरी मल्लीनाथी व्याख्या नहीं है, वह एक स्वतंत्र प्रबंध है और उसमें नैतिक सत्यका उचित निरूपणभी है। अपनी सूक्ष्म और व्यापक विचारप्रणाली तथा प्रभावोत्पादक बाबू अरविंद घोष लेखनशैलीके कारण मराठी भाषाकी पहला श्रेणीका यह पहला प्रचंड गद्य-ग्रंथ अभिजात वाङ्मयमें समाविष्ट हुआ है। इस एकही ग्रंथसे सिद्ध होता है, कि यदि तिलकजी चाहते, तो मराठी साहित्य और नीतिशास्त्रके इतिहासमें एक अनोखा स्थान पा सकते। किंतु विधाताने उनकी महत्ताके लिये वाङ्मय-क्षेत्र नहीं रखा था, इसलिये केवल मनोरंजनार्थ उन्होंने अनुसंधानका महान् कार्य किया। यह घटना अर्थपूर्ण है, कि उनकी कीर्ति अजरामर करनेवाले उनके अनुसंधान-ग्रंथ, उनके जीवितकार्योंसे विवशतापूर्वक लिये गये विश्रांति-कालमें निर्मित हुए हैं। स्वर्गीय तिलकजीकी प्रतिभाके ये गौण आविष्कारभी इस हेतुसे संबद्ध हैं, कि इस राष्ट्रका महान् भवितव्य उसके उज्ज्वल गतेतिहासके योग्य हो। गीतारहस्यका विषय जो गीता-ग्रंथ है, वह भारतीय आध्यात्मिकताका परिपक्व सुमधुर फल है। मानवी श्रम, जीवन और कर्मकी महिमाका उपदेश अपनी अधिकारवाणीसे देकर, सच्चे अध्यात्मका सनातन संदेश गीता दे रही है, जो कि आधुनिक कालके ध्येयवादके लिये आवश्यक है।"
- बाबू अरविंद घोष