भारतकोश
सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

Subhashita Ratna Bhandagara

पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा

स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)

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३६सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां
दिवसे सनिधा ३८६।३६७दुग्धाम्भोधावगाधे १३८।८६दुर्मित्रीणं कमुप (पञ्च १ ५) १७५।९४६
दिवसोऽनुमित्र (शिशु ९ १७) २९६।५दुन्दुभिस्तु सुतरामचे ६४।१३दुर्मैत्री राज्यना १५६।१३७
दिवानिशं वारि (रसगङ्गाधर) २६५।२७३दुर्गंधिगम पर (पच ५ ३४) १७१।७७८दुर्योधन सम(शा प १३५७) १४६।१४८
दिवा पश्यति १५९।२६१दुर्धीता विषं (चाणक्य ९८) १६२।४२३दुर्लभं सस्कृत्त (चाणक्य ९१) १६१।३८६
दिवारजन्यो र(नैषध ७ ५५) २६२।१८३दुरापाध्या श्रि (पच १ ७३) १४८।२७०दुर्लभोऽप्युत्तम (दृ श ३३) १६८।६८६
दिव्यं चूतस (नीतिरत्न ९) २३५।१५८दुरापाध्या हि रा(पच १ ६८) १४८।२६८दुर्लीलकक्षीपतिपुत्र २४७।५९
दिव्यं वारि कथं यत ७।९०दुरारोह (काम नी ११ ३६) १४८।२६९दुर्वारवीर्य सरुषि २०२।९५
दिव्यचक्षुरह जात (सु १२०८) २७०।२दुरासदवनज्या(किरात.११ ६३) ७९।१२दुर्वास्रा स्मर(काव्यप्र १० ३०) २८५।३४
दिशि दिशि (नैषध २२ १५१) २१७।४०दुरासदान (किरात.११ २३) १६१।३६६दुर्वाशरातिवाजीव १३४।२९
दिशि दिशि परिहास २८०।४दुराशेव दरिद्रस्य ३४५।२दुर्वृत्तं वा सुवृत्तं(विक्रम.२८४) ३८६।३५४
दिशि दिशि (शा.प ३७२०) ३२३।१९दुरितसमूहबलाहक २।९दुर्वृत्त क्रियते धूर्तै (हि ३ १७५) ९७।५
दिशा हाराकारा (सु ४७६६) ३४१।५८दुर्गं त्रिकूट (गरुड अ ११३) ३८२।२७१दुर्वृत्तसगतिरनर्थ (महा ना ४०८)८८।१२
दिशो वास ३८२।२४१दुर्गदेशप्रविष्टोऽपि १५०।३५८दुष्करितैरेव निजै(शा.प ११७५) ५८।१६०
दिश्यात्म शीतकिरणा (सु ६४) ४।३९दुर्गाणि राज्ञा (शा प १३६१) १४४।६८दुष्टता दुष्टससर्गाद्दुष्ट ८७।३
दिश्यात्सुखं नरहरि (सु ८५) १९।४६दुर्गा नदी शि (शा प ११८६) २४६।४०दुष्टा भार्या (गरुड पू १०८) १५५।१११
दिश्याद्व शकुलाङ्क (शा प १२३) १७।८दुर्जन कृतशिकोऽपि ५४।२४दुष्टाविनीता (शा प.१४११) १४५।१०५
दिश्यान्महाशुरशिर स (सु ७७) १९।२१दुर्जन परिवर्तव्यो (हि १ ८९) ५४।५दुष्टैरपि निजै (शा प १४३९) १५३।१६
दीना दीनमुखैस्तथै (सु ३१९६) ९७।१२दुर्जन परिहर्तव्य (सु ३५५) ५५।७०दूति त्वं तरुणी (सु.११८६) २८७।९
दीनाना कल्पवृक्ष (मृच्छ १ ४८) ५३।२७६दुर्जन प्रियवादी च (हि १ ८२) ५५।४९दूति त्वया कृतमहो २९३।५
दीनानामिह प (भामिनी अ ९१) २१२।३६दुर्जन सुजनीकर्तु (सु ३८७) ५६।११४दूति श्वासविशेष एष २०३।९
दीनोन्नतचलप (शा प ८५३) २२६।१५३दुर्जन सुजनो न ५४।३५दूतीद नयनोत्पलद्वय २०३।८
दीपदशा कुलयुवती ३५१।२१दुर्जनगम्या (पच १ ३०१) १७०।७७२दूति विधुदुपागता ३५७।३४
दीपनिर्वाणगन्ध (हि १ ७६) १६३।४४८दुर्जनजनससर्गात्स ८८।१०दूतो न सचराति खे (वृ चा ९ ५) ४४।४
दीपयन्रोदसीरन्ध्र (सा द ४ १४) १३३।३दुर्जनदूषितमनसा (सु ३९०) ५६।१२४दृये कान्ताकर वीक्ष्य ६६।१०
दीपयन्नथ नभ (किरात ९.२३) ३००।४०दुर्जन प्रथमं वन्दे ५४।३४दूरं मुक्तालयता (स क ५.१७६) २९१।८
दीपा स्थितं वस्तु (सु २५८) ४९।१८१दुर्जनवचनाङ्गारैर्दग्धो ४७।९०दूरं यान्तु निशाच २०९।१८
दीपितस्मरमुरस्तु (शिशु १० ४७) ३१६।७दुर्जनचदनविनिर्गं ४८।१२०दूरं सुन्दरि निर्ग (सु १०६३) ३२९।१८
दीपो भक्षयते (वृ चा ८ ३) १५८।२४२दुर्जनसगति (विक्रम १९७) ३८४।२८३दूरत शोभते (चाणक्य १५) १६१।३४४
दीप्तक्षुद्रेगयोगाद्व (शा प ४०६५) १३।४०दुर्जनसहवासादपि ४८।१२९दूरतया स्थूलतया २२२।५८
दीप्प्यन्ता ये दीप्त्ये ७९।१७दुर्जनस्य विशिष्टत्वं ५४।२७दूरमस्तु दरघूर्णित २७८।३४
दीर्घेशृङ्गमनड्वाहं १६८।६५६दुर्जनस्य च सर्प (वृ चा ३ ४) ३७९।९१दूरलमप्रमेयैर २९४।१९
दीर्घाक्षं शरदिन्दु(मालवि २ ३) २७२।७०दुर्जनहुताशत्तप (शा प १५३) ३७।११दूरस्थं जलमध्यस्थं १५५।१००
दीर्घा वन्दनमालि (अमरु ४५) ३०५।४दुर्जनेन समं सख्यं (हि १ ८०) ५५।४८दूरस्था पवेता १५८।२१८
दीर्णोऽसि चेत्कनक २४६।२७दुर्जनैरुच्यमानानि (हि ३ २३) ५५।४१दूरस्थापितहृदयो ५७।१४०
दीव्यन्मौलित्रिदशपरि ५।४७दुर्जनो जीयते (दृ.श ४६) १६८।६९१दूरस्थोऽपि ब (शा प.१६०९) १४३।५३
दु ख दीर्घतर वह २७७।६४दुर्जनो दूषयत्येव सता (दृ श ३) ५।७३दूरस्थोऽपि स (विक्रम ७८) १६६।५९१
दु खं दु खमिति (प्र भ १७) ६६।१३दुर्जनो दोषरादत्ते दुर्गन्धे ५५।४६दूरादर्थं घटयति (भर्तृ ३ १८) १४२।३१
दु खाङ्गारकतौ (शान्तिश ३ १४) ८९।३दुर्जनो नार्जव याति (हि ३ २३) ५४।३९दूरादर्थिनमाकलय्य ९९।२४
दु खेन ल्छि (मा १२ ४१६७) १५४।५४दुर्दिंवेसे घनतिमि (पच १ १८४) ३५२।४दूरादुच्छ्रितपाणि (हि ३ १६४) ६१।२६२
दु प्रापमम्बु पवन २३४।१२७दुर्दैवप्रभवप्रभञ्जन २३०।६दूरादुत्सुकभागते (अमरु ४९) ३५८।६१
दु प्रेक्ष्यमुच्चैर्गगन ३३५।८दुर्बलस्य बलं रा (चाणक्य ३६) १५२।३९३दूरादुज्झति (सूक्ति १९.१०) २२४।१०४
दु सहसतापभया (सु १६९९) ३३६।३५दुर्बुद्धिमकृतप्र(भा ५ १४९४) ३९४।६७२दूरादेव कृतोऽज(सु १७०९) ३३९।११९
दुकूलं दोर्मूलात्प्रण ३१९।३४दुर्भग स्यात्प्रकृ (दृ श ८३) १६९।७०९दूरीकरोति कुमतिं (रसगगाधर) ८७।३०
दुग्ध च यत्तदनु (सु.३२५९) ७६।३९दुर्भिक्षादेव (मा १२.६७४७) ३९३।६६४दूरेऽपि परत्यागस्ति (सु ८०७) ५८।१८१