सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)

सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
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| ३६ | सुभाषितरत्नभाण्डागारस्थपद्यानां |
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| दिवसे सनिधा ३८६।३६७ | दुग्धाम्भोधावगाधे १३८।८६ | दुर्मित्रीणं कमुप (पञ्च १ ५) १७५।९४६ |
| दिवसोऽनुमित्र (शिशु ९ १७) २९६।५ | दुन्दुभिस्तु सुतरामचे ६४।१३ | दुर्मैत्री राज्यना १५६।१३७ |
| दिवानिशं वारि (रसगङ्गाधर) २६५।२७३ | दुर्गंधिगम पर (पच ५ ३४) १७१।७७८ | दुर्योधन सम(शा प १३५७) १४६।१४८ |
| दिवा पश्यति १५९।२६१ | दुर्धीता विषं (चाणक्य ९८) १६२।४२३ | दुर्लभं सस्कृत्त (चाणक्य ९१) १६१।३८६ |
| दिवारजन्यो र(नैषध ७ ५५) २६२।१८३ | दुरापाध्या श्रि (पच १ ७३) १४८।२७० | दुर्लभोऽप्युत्तम (दृ श ३३) १६८।६८६ |
| दिव्यं चूतस (नीतिरत्न ९) २३५।१५८ | दुरापाध्या हि रा(पच १ ६८) १४८।२६८ | दुर्लीलकक्षीपतिपुत्र २४७।५९ |
| दिव्यं वारि कथं यत ७।९० | दुरारोह (काम नी ११ ३६) १४८।२६९ | दुर्वारवीर्य सरुषि २०२।९५ |
| दिव्यचक्षुरह जात (सु १२०८) २७०।२ | दुरासदवनज्या(किरात.११ ६३) ७९।१२ | दुर्वास्रा स्मर(काव्यप्र १० ३०) २८५।३४ |
| दिशि दिशि (नैषध २२ १५१) २१७।४० | दुरासदान (किरात.११ २३) १६१।३६६ | दुर्वाशरातिवाजीव १३४।२९ |
| दिशि दिशि परिहास २८०।४ | दुराशेव दरिद्रस्य ३४५।२ | दुर्वृत्तं वा सुवृत्तं(विक्रम.२८४) ३८६।३५४ |
| दिशि दिशि (शा.प ३७२०) ३२३।१९ | दुरितसमूहबलाहक २।९ | दुर्वृत्त क्रियते धूर्तै (हि ३ १७५) ९७।५ |
| दिशा हाराकारा (सु ४७६६) ३४१।५८ | दुर्गं त्रिकूट (गरुड अ ११३) ३८२।२७१ | दुर्वृत्तसगतिरनर्थ (महा ना ४०८)८८।१२ |
| दिशो वास ३८२।२४१ | दुर्गदेशप्रविष्टोऽपि १५०।३५८ | दुष्करितैरेव निजै(शा.प ११७५) ५८।१६० |
| दिश्यात्म शीतकिरणा (सु ६४) ४।३९ | दुर्गाणि राज्ञा (शा प १३६१) १४४।६८ | दुष्टता दुष्टससर्गाद्दुष्ट ८७।३ |
| दिश्यात्सुखं नरहरि (सु ८५) १९।४६ | दुर्गा नदी शि (शा प ११८६) २४६।४० | दुष्टा भार्या (गरुड पू १०८) १५५।१११ |
| दिश्याद्व शकुलाङ्क (शा प १२३) १७।८ | दुर्जन कृतशिकोऽपि ५४।२४ | दुष्टाविनीता (शा प.१४११) १४५।१०५ |
| दिश्यान्महाशुरशिर स (सु ७७) १९।२१ | दुर्जन परिवर्तव्यो (हि १ ८९) ५४।५ | दुष्टैरपि निजै (शा प १४३९) १५३।१६ |
| दीना दीनमुखैस्तथै (सु ३१९६) ९७।१२ | दुर्जन परिहर्तव्य (सु ३५५) ५५।७० | दूति त्वं तरुणी (सु.११८६) २८७।९ |
| दीनाना कल्पवृक्ष (मृच्छ १ ४८) ५३।२७६ | दुर्जन प्रियवादी च (हि १ ८२) ५५।४९ | दूति त्वया कृतमहो २९३।५ |
| दीनानामिह प (भामिनी अ ९१) २१२।३६ | दुर्जन सुजनीकर्तु (सु ३८७) ५६।११४ | दूति श्वासविशेष एष २०३।९ |
| दीनोन्नतचलप (शा प ८५३) २२६।१५३ | दुर्जन सुजनो न ५४।३५ | दूतीद नयनोत्पलद्वय २०३।८ |
| दीपदशा कुलयुवती ३५१।२१ | दुर्जनगम्या (पच १ ३०१) १७०।७७२ | दूति विधुदुपागता ३५७।३४ |
| दीपनिर्वाणगन्ध (हि १ ७६) १६३।४४८ | दुर्जनजनससर्गात्स ८८।१० | दूतो न सचराति खे (वृ चा ९ ५) ४४।४ |
| दीपयन्रोदसीरन्ध्र (सा द ४ १४) १३३।३ | दुर्जनदूषितमनसा (सु ३९०) ५६।१२४ | दृये कान्ताकर वीक्ष्य ६६।१० |
| दीपयन्नथ नभ (किरात ९.२३) ३००।४० | दुर्जन प्रथमं वन्दे ५४।३४ | दूरं मुक्तालयता (स क ५.१७६) २९१।८ |
| दीपा स्थितं वस्तु (सु २५८) ४९।१८१ | दुर्जनवचनाङ्गारैर्दग्धो ४७।९० | दूरं यान्तु निशाच २०९।१८ |
| दीपितस्मरमुरस्तु (शिशु १० ४७) ३१६।७ | दुर्जनचदनविनिर्गं ४८।१२० | दूरं सुन्दरि निर्ग (सु १०६३) ३२९।१८ |
| दीपो भक्षयते (वृ चा ८ ३) १५८।२४२ | दुर्जनसगति (विक्रम १९७) ३८४।२८३ | दूरत शोभते (चाणक्य १५) १६१।३४४ |
| दीप्तक्षुद्रेगयोगाद्व (शा प ४०६५) १३।४० | दुर्जनसहवासादपि ४८।१२९ | दूरतया स्थूलतया २२२।५८ |
| दीप्प्यन्ता ये दीप्त्ये ७९।१७ | दुर्जनस्य विशिष्टत्वं ५४।२७ | दूरमस्तु दरघूर्णित २७८।३४ |
| दीर्घेशृङ्गमनड्वाहं १६८।६५६ | दुर्जनस्य च सर्प (वृ चा ३ ४) ३७९।९१ | दूरलमप्रमेयैर २९४।१९ |
| दीर्घाक्षं शरदिन्दु(मालवि २ ३) २७२।७० | दुर्जनहुताशत्तप (शा प १५३) ३७।११ | दूरस्थं जलमध्यस्थं १५५।१०० |
| दीर्घा वन्दनमालि (अमरु ४५) ३०५।४ | दुर्जनेन समं सख्यं (हि १ ८०) ५५।४८ | दूरस्था पवेता १५८।२१८ |
| दीर्णोऽसि चेत्कनक २४६।२७ | दुर्जनैरुच्यमानानि (हि ३ २३) ५५।४१ | दूरस्थापितहृदयो ५७।१४० |
| दीव्यन्मौलित्रिदशपरि ५।४७ | दुर्जनो जीयते (दृ.श ४६) १६८।६९१ | दूरस्थोऽपि ब (शा प.१६०९) १४३।५३ |
| दु ख दीर्घतर वह २७७।६४ | दुर्जनो दूषयत्येव सता (दृ श ३) ५।७३ | दूरस्थोऽपि स (विक्रम ७८) १६६।५९१ |
| दु खं दु खमिति (प्र भ १७) ६६।१३ | दुर्जनो दोषरादत्ते दुर्गन्धे ५५।४६ | दूरादर्थं घटयति (भर्तृ ३ १८) १४२।३१ |
| दु खाङ्गारकतौ (शान्तिश ३ १४) ८९।३ | दुर्जनो नार्जव याति (हि ३ २३) ५४।३९ | दूरादर्थिनमाकलय्य ९९।२४ |
| दु खेन ल्छि (मा १२ ४१६७) १५४।५४ | दुर्दिंवेसे घनतिमि (पच १ १८४) ३५२।४ | दूरादुच्छ्रितपाणि (हि ३ १६४) ६१।२६२ |
| दु प्रापमम्बु पवन २३४।१२७ | दुर्दैवप्रभवप्रभञ्जन २३०।६ | दूरादुत्सुकभागते (अमरु ४९) ३५८।६१ |
| दु प्रेक्ष्यमुच्चैर्गगन ३३५।८ | दुर्बलस्य बलं रा (चाणक्य ३६) १५२।३९३ | दूरादुज्झति (सूक्ति १९.१०) २२४।१०४ |
| दु सहसतापभया (सु १६९९) ३३६।३५ | दुर्बुद्धिमकृतप्र(भा ५ १४९४) ३९४।६७२ | दूरादेव कृतोऽज(सु १७०९) ३३९।११९ |
| दुकूलं दोर्मूलात्प्रण ३१९।३४ | दुर्भग स्यात्प्रकृ (दृ श ८३) १६९।७०९ | दूरीकरोति कुमतिं (रसगगाधर) ८७।३० |
| दुग्ध च यत्तदनु (सु.३२५९) ७६।३९ | दुर्भिक्षादेव (मा १२.६७४७) ३९३।६६४ | दूरेऽपि परत्यागस्ति (सु ८०७) ५८।१८१ |