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सुभाषितरत्नभाण्डागार (पण्डित काशीनाथ शर्मा संग्रह)
Subhashita Ratna Bhandagara
पण्डित काशीनाथ शर्मा (सम्पादक: नारायण राम आचार्य) द्वारा
स्रोत: Subhashita Ratna Bhandagara (10,000+ Classic Sanskrit Epigrams & Maxims - Nirnaya Sagar Press) (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished516 पृष्ठ
पृष्ठ 516स्थायी लिंक
शुद्धिपत्रम्
| अशुद्धम् | शुद्धम् | पृ. | श्लो. |
|---|---|---|---|
| यन्नन्त्र | यन्नमन्त्र | ३७७ | १५ |
| मूल | मूल | ,, | २५ |
| यलन | यत्नेन | ,, | २६ |
| पूजयि वा | पूजयित्वा | ,, | ३० |
| प्रतिष्ठे । | प्रतिष्ठेता | ,, | ३१ |
| क्लैव्य | क्लैव्यं | ३७८ | ६७ |
| दारुभ्य | दारुभ्यो | ३८० | १११ |
| जयेत्क्रुद्दो | जयेत्क्रुद्धो | ,, | १२० |
| श्मश्रुद्रोध | श्मश्रूद्बोध | ,, | १३० |
| मयं गच्छल्यसुत्र | मर्य सह गच्छत्य | ३८२ | १९४ |
| अभिमान | अभिमान् | ,, | २२३ |
| हन्या पूर्वा | हन्यात्पूर्वां | ,, | २३० |
| मूर्ख विचारणैषा | मूर्खविचारणैषा | ३८३ | २७० |
| वपुमृग | वपुर्मृग | ३८४ | २७६ |
| सजयाते | सजायते | ,, | २८१ |
| जलाकाना | जलौकाना | ,, | २८४ |
| ऐण | ऐणे | ,, | २९० |
| खभवो | स्वभावो | ,, | २९६ |
| जीन्मिवेतैन | जीवेन्मितेन | ,, | २९८ |
| मेत्री | मैत्री | ,, | ३०० |
| निकामकमा | निकामकाम | ,, | ३०६ |
| क्रुद्धत्य | क्रुद्धस्य | ३८६ | ३४५ |
| स्तत्त्व | सत्त्वं | ३८७ | ४०५ |
| भक्त | भक्ते | ३८८ | ४५० |
| समार्जनी रज | समार्जनीरजो | ३८९ | ४८५ |
| भा नाश्नति | भार्याजितस्य नाश्नन्ति | ,, | ४८६ |
| यत्त | यत्तु | ३९० | ५१४ |
| मुनिहित | सुनिहित | ३९१ | ५६७ |
| त्प्रमाणक स्तस्य | त्प्रमाण कस्तस्य | ,, | ५७० |
| भोजने | भोजने जने | ,, | ५७५ |
| कर्तव्योऽध्यैन | कर्तव्योऽध्ययने | ,, | ,, |
| बह्लैका | ब्रह्मैका | ३९१ | ५८४ |
| श्लाध्य | श्लाघ्य | ,, | ६१२ |
| भायया भता | भार्यया भर्ता | ,, | ६१९ |
| कायास्तते | कायास्तटे | ३९३ | ६४२ |
| जलाद्युतिमतो | जलाद्ध्रुतिमतो | ,, | ६४२ |
| दोग्धव्यं | द्रोग्धव्यं | ३९४ | ६९२ |
| धार्मात्मन | धर्मात्मानः | ,, | ६९४ |