सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
पृष्ठ 102, कुल 108 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / १०७ रहियो आवत जात इत कहत न लागी लाज। ऐसे आवन जान तें हौं अब आयौ बाज ॥३६॥ इन सोचन सोचत चले हरि को अति दुख मानि। घर की सुधि बँम्हनै नहीं दीन्हीं सुख की खानि ॥३७॥ कवित्त जगर-मगर जोति छाय रही चहुं ओर, अगर-बगर हाथी घोरन कौ सोर है। चौपर को वनो है बजारे पुनि सोरन के, महल दुकान की कतार चहुं ओर है॥ भीर-भार धकापेल चहुं दिसि देखियत, द्वारिका तें दूनों यहाँ प्यादन कौ जोर है॥ रहिबो को ठाम है न, काहु सों पिछान मेरी, बिन जाने बसे कोउ हाड़ मेरे तोरे है ॥३८॥ वेई सुरतरु प्रफुलित फुलवारिन मैं, वेई सरवर हँस बोलन-मिलन कों। वेई हेम-रिन दिसान दहलीजन मैं, वेई गजराज हय गरज पिलन कों। द्वार द्वार छरी लिए द्वारपौँरिया हैं खरे, बोलत मरोर बरजोर त्यों झिलन कों। द्वारिका तें चल्यौ भूलि द्वारिका ही आयौ नाथ, मांगियो न मो पै चारि चाउर गिलन कों ॥३६॥ फूटी एक थारी बिना टोंटनी की झारी हुतीं, बांस की पिटारी औ कथारी हुती टाट की, बेंठे बिन छुरी औ कमंडल सौ टूंक बहौ, फटे ते पाये पाटी टूटी एक खाट की।