भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / १०६ चौंतरा उजारि कोऊ चामीकर-धाम कियो, छानी तो उपारि डारि छाई चित्रसारी जू । जौ हौं होतो घर पै तो काहे को उठन देतो, होनहार ऐसी खोटी दसाई हमारी जू । हौं तो हो न, काहू लोभ काहू को दिखायौ वाहि, महल उठाय लयो हाय ! सुखकारी जू । लामी लूमवारी दुःख सूल को दलनहारी, गैया बनवारी काहू सोऊ मारि डारि जू ॥४७॥ दोहा द्वारपाल त्रिय एक सों कहि पठयो यह बात । सुनत चली आनंद भरी पुनि पुनि पुलकित गात ॥४८॥ सवैया तोरि डारी झोपरी करे हैं रुचि धौरहर, सुरपुर ध्रुवलोक गार गार ग्रसे हैं । अंग अंग पांति पांति लागे मनि मानिक हैं, संपदा कि भीतिन प्रबाल लाल लसे हैं । कृष्न की कृपा तें रिद्धि सिद्धिन समेत सब, कामधेनु कामतरु ते ही आनि फँसे हैं । हसि हसि बोलति सुदामा जू की बामा प्यारी, घरै आवौ घर बसे खासे घर बसे हैं ॥४६॥ मैं घर भुलानो भूलि कौन के महल आयौ, जहां लागे लाल जाल बिद्रुम महामनी । कौन की विचित्र नारि करै मनुहारि मैं तो, सकौं न निहारि नखसिख सिद्धि सौं सनी ।