सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुदामा-चरित / १११ कवित्त कृपा कीन्हीं भारी मानियारी निरधारी तुम्हें, सुख के समूह चले आवैं छितिछोर तें । दसा जो हमारी सोऊ अधिकारी सों तिहारी, प्यारे भारी जानि कै निहारि कृपा कोर तें । पंडित हौं बड़ो कहा भूले गज बाजि देखि, कृष्न की कृपा तें धन होत बहुजोर तें । रुक्मिनीरमन के चरन दरसन ही ते, सबै सुख बरसें है आनि चहुं ओर तें ॥५६॥ दोहा सोचत जो आनंद करौ भरौ मोद मन माहिं। भक्ति करौ यदुनाथ की अब संसै कछु नाहिं ॥५७॥ बिप्र सुदामा सहित तिय उमगे परमानन्द । नितप्रति सुमिरन करत हैं हिय धरि करुनाकंद ॥५८॥ कृष्न सुदामा मित्रई कह्यो नरोत्तमदास । कहत सुनत जो हित करै ताको कबहुँ न त्रास ॥५६॥ कुण्डलिया चरित सुदामाकृष्न को पढ़ै गुनै करि हेत । ताकों सगरी संपदा कृष्न कृपा करि देत । कृष्न कृपा करि देत बात सांची यह मानौ । यामें कछु न असत्य सत्य करि सत्य सु जानौ ।