सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ / सुदामा-चरित कर, मित्र का कुशल समाचार पूछते हैं। यह सभी कुछ देखकर सुदामा चकित रह जाता है— “बौल्यौ द्वारपालक 'सुदामा नाम पांडे सुनि, छांड़े सबै राजकाज जी की गति जानै को ? द्वारिका के नाथ हाथ जोरि धाय गहे पाँय, भेंटे लपटाय हिय ऐसे दुख मानै को ? नैन दोऊ जल भरि पूछत कुशल हरि, विप्र बोल्यो विपदा में मोहिं पहिचानै को ? जैसी तुम कीन्हीं तैसी करै को कृपा के सिंधु ! जैसी प्रीति दीनबन्धु ! दीनन पै आनै को ?” श्रीकृष्ण के मित्र-वत्सल रूप के साथ-साथ उनके विनोद-प्रिय रूप को भी कविवर नरोत्तमदास ने अति सुन्दर अभिव्यक्ति दी है। सुदामा के कहने पर उसकी पत्नी ने उसे पाव सेर चावल एक पोटरी में बाँधकर दिए थे। द्वारिका- पुरी के अपार वैभव को देखकर, सुदामा संकोच में पड़ गए कि भेंट स्वरूप वह पोटरी श्रीकृष्ण को दें या नहीं। उनकी इस दुविधामय मनःस्थिति को भाँप कर श्रीकृष्ण अपनी विनोद-प्रिय प्रकृति का परिचय देते हैं— “कछु भाभी हमको दियो, सो तुम काहि न देत । चाँपि पोटरी काँख में, रहौ कहौ केहि हेत ॥ इतना ही नहीं, वे अपने मित्र के संकोच को दूर करने के लिए बाल्य-काल की एक चोरी की घटना का स्मरण कराते हैं। उस पर मधुर व्यंग्य-बाण भी छोड़ते हैं— 'आगे चना गुरु-मातु दए ते लए तुम चाबि हमें नहिं दीने । स्याम कह्यौ मुसुकाय सुदामा सौं चोरी की बानि में हो जु प्रबीने ॥ 'सुदामा-चरित' में श्रीकृष्ण के अलौकिक रूप को भी कवि ने सुरक्षित रखा है। वे सामान्य मनुष्य नहीं वरन् परब्रह्म हैं, उन्हें दीनबन्धु, पतितपावन आदि नामों से भी सम्बोधित किया जाता है। उन्होंने संकट में सदा अपने भक्तों की रक्षा की है। उनके इस विराट रूप से सुदामा की पत्नी भली-भाँति परिचित