भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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३२ / सुदामा-चरित हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठियौ ठलि, कहि हौं धन सों जाइके, अब धन धरौ सकेलि ॥” भाव-वर्णन में ही नहीं, वस्तु-वर्णन में भी कवि कई मर्मस्पर्शी शब्द-चित्र अंकित करता है। वे शब्द-चित्र मुख्यतः द्वारिकापुरी के वैभव और उसके बाद सुदामापुरी के वैभव से सम्बद्ध हैं। श्रीकृष्ण जो अपार वैभव सुदामा को देते हैं, उसे देखकर राजा इन्द्र भी लजा जाते हैं। उसी का एक शब्द-चित्र प्रस्तुत करता हुआ कवि कहता है— कै वह टूटी सी छानी हुती, कहाँ कंचन के सब धाम सुहावत, कै पग में पनही न हुती, कहाँ लै गजराजहु ठाढ़े महावत । भूमि कठोर पै रैन कटै, कहाँ कोमल सेज पै नींद न आवत, कै जुरतौ नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के प्रताप ते दाख न भावत ॥” ‘सुदामा-चरित’ का वर्णन कौशल मुख्यतः दो शैलियों में मुखरित हुआ है – वर्णनात्मक शैली और नाटकीय शैली । कथा-प्रसंगों को गतिशीलता प्रदान करने के लिए वर्णनात्मक शैली को और भावपूर्ण मार्मिक स्थलों के लिए नाटकीय शैली को अपनाना कवि अधिक उपयुक्त समझता है। भावपूर्ण स्थलों के चित्रण में कवि का मन विशेष रूप से रमा है और ऐसे स्थल भाव-सम्पदा के अनूठे उदाहरण बन गए हैं। इन स्थलों के कलात्मक सौष्ठव का श्रेय उसकी नाटकीय शैली को दिया जा सकता है। इस शैली के प्रयोग से इस रचना में कौतूहल, रोचकता, प्रभावोत्पादकता तथा मार्मिकता का संचार हुआ है। छन्द-योजना—‘सुदामा-चरित’ में मुख्यतः दोहा, कवित्त, सवैया आदि छन्दों की योजना हुई है। ये छन्द विषय एवं प्रसंग के अनुरूप अपने स्वाभाविक रूप में प्रयुक्त हुए हैं। इन छन्दों में दोहा छन्द का प्रयोग कवि ने वर्णनात्मक प्रसंगों में कथा-विकास को दृष्टि में रखकर किया है। वह कथावस्तु के विविध मोड़ों और आग-पीछे के प्रसंगों को परस्पर जोड़ने के निमित्त इस छन्द के प्रयोग को सर्वाधिक उपयोगी समझता है। कथावृत्त का प्रारम्भ, द्वारिकापुरी में प्रवेश, वहाँ से प्रस्थान और सुदामापुरी में प्रवेश के विभिन्न अवसरों पर यह छन्द विशेषतः प्रयुक्त हुआ है। इस छन्द का सौष्ठव सांकेतिक अभिव्यंजना और