भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 108 में से

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सुदामा-चरित / ३५ अंगी रस मान सकते हैं। किन्तु इस रचना का निर्माता आदर्श-मैत्री के उदात्त भाव को सर्वोच्च प्राथमिकता देता प्रतीत होता है। यही मित्र वत्सलता का उदात्त भाव इस खण्ड-काव्य का केन्द्रीय भाव है, जिसकी प्रतिष्ठा ही कवि का अभीष्ट है। 'सुदामा-चरित' के प्रारम्भ में कवि सुदामा की दीन-हीन दशा का मर्म- स्पर्शी निरूपण करके पाठकों के हृदय में स्थित करुणभाव को जागृत करता है। सुदामा का दाम्पत्य जीवन करुण रस से परिप्लावित है। पाठक उससे पूर्णतः सहानुभूति रखते हैं। श्रीकृष्ण भी उसकी दयनीय दशा देखकर द्रवित हो जाते हैं— "देखि सुदामा की दीन दशा करुणा करिके करुणानिधि रोये । पानी परात कौ हाथ छुयौ नहिं नैनन के जल सों पग धोए ॥" सुदामा की वैराग्य-भावना, प्रभु-भक्ति, सांसारिक वैभव के प्रति उदा- सीनता आदि के निरूपण में शांत रस की व्यंजना दृष्टिगत होती है। सुदामा का सन्तोष एवं निष्काम भक्ति-भाव पाठकों के निर्वेद स्थायी भाव को जागृत करता है। पाठक शांत-रस का रसास्वादन करने लगते हैं। किन्तु अद्भुत और भक्ति-रस की व्यंजना अपेक्षाकृत अधिक होने से पाठक उन्हीं की ओर आकृष्ट होते प्रतीत होते हैं। ये रस परस्पर विरोधी नहीं कहे जा सकते हैं। अद्भुत- रस का स्थायी भाव विस्मय है और भक्ति-रस का भक्ति । दोनों में चमत्कार या विस्मय का भाव निश्चित रूप से निहित रहता है। "सुदामा-चरित्र' में एक ओर भाग्य का और दूसरी ओर भक्ति का चमत्कार व्यंजित हुआ है। सुदामा की अपार निर्धनता और ऐश्वर्य की कहानी मुख्यतः भाग्य के रज्जू से बंधी हुई है। भाग्य के चमत्कार से ही टूटी-फूटी झोंपड़ी में रहने वाला दरिद्र सुदामा, सोने के भवन में रहने लगता है। कवि इस विस्मयकारी परिवर्तन का निरूपण करता हुआ कहता है— "कै वह टूटी सी छानी हुती, कहं कंचन के सब धाम सुहावत । कै पग में पनही न हुती, कहं गजराजहु ठाढ़े महावत ।

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक) · पृष्ठ 30, कुल 108 में से · BharatKosha