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सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ३७ समझा। 'महाभारत' एवं 'श्रीमद्भागवत' में उनके महान् व्यक्तित्व की जो असंख्य मणियाँ विकीर्ण मिलती हैं, उन्हें भली प्रकार से संजोने का कार्य अभी शेष है। इस गुरुतर कार्य के एक अंश को पूरा करने का स्तुत्य प्रयास हम 'सुदामा-चरित' में देखते हैं। कविवर नरोत्तमदास ने श्रीकृष्ण के उदात्त मैत्री- आदर्श को अपनी इस रचना में प्रतिष्ठित किया है। निस्सन्देह 'सुदामा-चरित' की पूर्ववर्त्ती एवं परवर्त्ती काव्य-रचनाओं में सुदामा के दारिद्र्य-भंजन की कथा को लेकर अनेक कवियों ने लेखनी उठाई। किन्तु इस दिशा में जो सफलता कविवर नरोत्तमदास को मिली वह अन्य किसी कवि को नहीं। सुदामा के दारिद्र्य-वर्णन और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का मर्मस्पर्शी वर्णन करने में 'सुदामा-चरित' के निर्माता अपूर्व सफलता गौरवमयी है। उसी से यह काव्य युग-युगों तक पाठकों के हृदय-तल को स्पर्श करता रहेगा। और श्रीकृष्ण की आदर्श-मैत्री का सन्देश देता रहेगा। कविवर नरोत्तमदास से पूर्व महाकवि सूरदास ने निर्धन सुदामा की कथा को अपने 'सूरसागर' के बीस पदों में चित्रित किया है, किन्तु इस भावपूर्ण प्रसंग को वे अधिक मार्मिकता प्रदान नहीं कर सके हैं। श्रीकृष्ण के उदात्त मैत्री- आदर्श को प्रतिष्ठित करना उनका अभीष्ट भी प्रतीत नहीं होता है। अष्टछाप के दूसरे प्रसिद्ध कवि नन्ददास ने भी 'सुदामा-चरित' का सृजन किया था, किन्तु वह अनुपलब्ध है। कुछ विद्वानों के अनुसार वह उनकी 'सम्पूर्ण भाषा भागवत' नामक अप्राप्य रचना का अंश है। नरोत्तमदास कृत 'सुदामा-चरित' अपने पूर्व- वर्त्ती सुदामा विषयक काव्य-ग्रन्थों से निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ रचना है। नरोत्तमदास के परवर्त्ती अनेक कवियों ने भी इस क्षेत्र में कार्य किया, यथा—सं० १६८३ के आसपास आलम कवि ने 'सुदामा-चरित' की रचना रेखता में की। यह केवल ६० पद्यों का लघु काव्य है। सं० १७३१ में के लग- भग कवि कालीराम ने 'सुदामा-चरित' का सृजन ब्रजभाषा में किया। अठा- रहवीं शताब्दी में जिन कवियों ने सुदामा-चरित से सम्बद्ध काव्य-रचनाओं का सृजन किया, उनमें माखन, खण्डन, वीर आदि कवियों के नाम उल्लेखनीय हैं। उन्नीसवीं शताब्दी में इस परम्परा को विकास प्रदान करने वाले प्रमुख कवि