सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकविवर नरोत्तमदास और उनका सुदामा चरित
नरोत्तमदास भक्तिकालीन कवि हैं। भक्तिकाल को हिन्दी-साहित्य के इतिहास का स्वर्णकाल माना जाता है। यह काल अनुभूति की गहन अभिव्यक्ति तथा भावप्रवणता के लिए विख्यात है। कविवर नरोत्तमदास की काव्य-रचना में भी ये विशिष्टताएँ चरमोत्कर्ष को प्राप्त हुई हैं। उनकी अमरकृति 'सुदामा-चरित' है, जिसकी स्तुति अनेक विद्वानों ने की है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में— "यद्यपि यह छोटा है पर इसकी रचना बहुत सरस और हृदय-ग्राहिणी है और कवि की भावुकता का परिचय देती है। भाषा भी बहुत ही परिमार्जित और व्यवस्थित है। बहुतेरे कवियों के समान भरती के शब्द और वाक्य इसमें नहीं हैं।" कविवर नरोत्तमदास की अन्य रचनाओं के नाम हैं—'ध्रुव-चरित', 'नाम संकीर्तन', और 'विचारमाला।' 'ध्रुव-चरित' के अभी तक केवल अट्ठाईस छन्द ही उपलब्ध हुए हैं। ये छन्द 'रसवंती' पत्रिका के अप्रैल १९६८ के अंक में प्रकाशित हो चुके हैं। 'विचार माला' और 'नाम संकीर्तन' की पाण्डुलिपियाँ अनुपलब्ध हैं; इनका उल्लेख हमें नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी की खोज रिपोर्ट में मिलता है। वस्तुतः नरोत्तमदास का महत्त्व रचनाओं की संख्या से नहीं वरन् उनकी काव्य-कला से आँका जाएगा। उनकी काव्य-रचना में जो हृदयस्पर्शी अभि- व्यंजना, स्वाभाविक जीवन अनुभूति की गहनता, भावप्रवणता और वर्णन-शैली का अद्भुत चमत्कार मिलता है, वह उन्हें अमरता प्रदान करने के लिए पर्याप्त है।