भारतकोश
सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)

Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary

महाकवि नरोत्तमदास द्वारा

DevanagariHindipublished108 पृष्ठ

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सुदामा-चरित / ४६ दूसरे पहिति भात सोंधो सुरभी को घृत, फूले-फूले फुलका प्रफुल्ल दुति मंद की ॥ पापर मुँगौरी बरा व्यंजन अनेक प्रीति— देवता बिलोकि रहे देवकि के नन्द की । या विधि सुदामाजू कों आछे कै जेंवाय प्रभु, पाछे तें पछ्यावरि परोसी आनि कंद की ॥५८॥ (दोहा) सात दिवस यहि विधि रहे, दिन-दिन आदर-भाव। चित चल्यौ घर चलन कौं, ताकर सुनौ बनाव ॥५६॥ (सवैया) दाहिने बेद पढ़ै चतुरानन, सामुहे ध्यान महेस धर्यौ है । बाएँ दुऔ कर जोरि लिए, सब देवन साथ सुरेस खर्यौ है ॥ एतेइ बीच अनेक लिए धन, पायन आय कुबेर पर्यौ है । देखि बिभौ अपनो सपनो, वपुरो वह बांभन चौंकि पर्यौ है ॥६०॥ (दोहा) देनो हुतौ सो दै चुके, बिप्र न जानी गाथ । चलती बेर गोपालजू, कछू न दीन्हों हाथ ॥६१॥ सुदामा वह पुलकनि वह उठि मिलनि, वह आदर की भाँति । यह पठवनि गोपाल की, कछू न जानी जाति ॥६२॥ घर-घर कर ओड़त फिरे, तनक दही के काज । कहा भयो जौ अब भयौ, हरि को राज-समाज ॥६३॥ हौं आवत नाहीं हुतौ, वाही पठ्यौ ठेलि । कहिहौं धन सों जाइकै, अब धन धरौ सकेलि ॥६४॥