सुदामा चरित (महाकवि नरोत्तमदास - ब्रजभाषा काव्य एवं सान्वय सटीक)
Sudama Charit of Mahakavi Narottamdas with Commentary
महाकवि नरोत्तमदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ / सुदामा-चरित सुदामा 'कहूँ सपनेहूँ सुबरन के महल होते, पौरि मनि-मंडप कलस कब धरते ? रतन जटित बर सिंहसन बैठिवे कौं, खरे ह्वै खवास मो पै चौंर कब ढरते ? देखि राज-सामा निज बामा सों सुदामा कहैं कब ये भंडार मेरे रतनन भरते ? जो पै पतिब्रता तू न देति उपदेश तो पै, एती कृपा मो पै द्वारिकेस कब करते ? ॥११८॥ (दोहा) उठे पहिरि अंबर रुचिर, सिहासन पर जाय । बैठे प्रभुता देखिकै, सुरपति रह्यो लजाय ॥११९॥ (सवैया) कै वह टूटी-सी छानी हती, कहूँ कंचन के सब धाम सुहावत । कै पग मैं पनही न हती, कहँ लैं गजराजहु ठाढ़े महावत ॥ भूमि कठोर पै रात कटे, कहँ कोमल सेज पै नींद न आवत । कै जुरतो नहीं कोदो सवाँ, प्रभु के परताप तें दाख न भावत ॥१२०॥ (दोहा) धन्य धन्य जदुबंस-मनि, दीनन पै अनुकूल । धन्य सुदामा सहित तिय, कहि बरसहिं सुर फूल ॥१२१॥